Summer express/शिमला, संजू -:भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) की परियोजनाओं में हिमाचल प्रदेश की बिजली हिस्सेदारी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने प्रदेश के हक में अहम फैसला सुनाया है। इस फैसले से हिमाचल को न केवल वर्षों से लंबित अपने अधिकार की बिजली मिलेगी, बल्कि प्रदेश की आर्थिक स्थिति को भी मजबूती मिलेगी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार हिमाचल प्रदेश को 11,973 मिलियन यूनिट बिजली दी जानी है। इसके साथ ही प्रदेश को प्रतिवर्ष लगभग 60 करोड़ यूनिट बिजली मिलने का रास्ता भी साफ हो गया है। सरकार का अनुमान है कि इस बिजली को बाजार में बेचकर हिमाचल को हर साल 600 से 800 करोड़ रुपये तक की अतिरिक्त आमदनी हो सकती है।
हिमाचल प्रदेश के महाधिवक्ता अनूप रतन ने इस फैसले को प्रदेश के लिए बड़ी उपलब्धि बताते हुए इसे दिवाली का तोहफा करार दिया। उन्होंने कहा कि बीबीएमबी में हिमाचल की हिस्सेदारी का मामला वर्ष 1996 से सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन था। इतने लंबे समय से प्रदेश अपने अधिकार की लड़ाई लड़ रहा था। पहले इस हिस्सेदारी के बदले हिमाचल को नकद भुगतान दिए जाने की बात चल रही थी, लेकिन मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने स्पष्ट किया कि प्रदेश को नकदी के बजाय बिजली चाहिए। मुख्यमंत्री का मानना था कि बिजली के रूप में मिलने वाली हिस्सेदारी प्रदेश के लिए अधिक फायदेमंद साबित होगी।अनूप रतन के अनुसार, मुख्यमंत्री ने बिजली आवंटन के समय को लेकर भी विशेष रूप से पैरवी की। सरकार चाहती थी कि हिमाचल को बिजली अक्टूबर से मार्च के बीच मिले, क्योंकि सर्दियों के इन महीनों में प्रदेश में बिजली की मांग अधिक रहती है और बाजार में भी बिजली की कीमतें ऊंची होती हैं। ऐसे में अतिरिक्त बिजली को बाजार में बेचकर प्रदेश बेहतर राजस्व जुटा सकेगा। यदि बिजली की औसत कीमत 10 रुपये प्रति यूनिट भी मानी जाए तो सालाना 600 से 800 करोड़ रुपये तक की आमदनी संभव है। अगले 20 वर्षों में यह लाभ लगभग 15 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।
महाधिवक्ता ने बताया कि केंद्र सरकार की ओर से पहले तैयार किए गए प्रस्ताव में हिमाचल के हितों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया था। इसमें अलग-अलग दरों के आधार पर नकद भुगतान की व्यवस्था प्रस्तावित थी। प्रदेश सरकार ने इस व्यवस्था को स्वीकार करने के बजाय बिजली के रूप में वास्तविक हिस्सेदारी देने की मांग उठाई। अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बीबीएमबी को हिमाचल की बिजली हिस्सेदारी तत्काल प्रभाव से जारी करनी होगी। इसमें पिछली अवधि का बकाया भी शामिल है। इससे प्रदेश को लंबे समय से लंबित अपने अधिकार का लाभ मिल सकेगा।
किशाऊ बांध परियोजना में भी हिमाचल ने उठाया आर्थिक हितों का मुद्दा
बीबीएमबी के अलावा किशाऊ बांध परियोजना को लेकर भी हिमाचल सरकार ने अपना पक्ष मजबूती से रखा है। महाधिवक्ता अनूप रतन ने बताया कि किशाऊ बांध परियोजना में दो प्रमुख हिस्से हैं, जिनमें वाटर कंपोनेंट और पावर कंपोनेंट शामिल हैं। वाटर कंपोनेंट के लिए केंद्र सरकार ने 90:10 के अनुपात में खर्च वहन करने का प्रावधान किया था, जबकि बिजली उत्पादन से जुड़े पावर कंपोनेंट का खर्च हिमाचल और उत्तराखंड को 50:50 के अनुपात में उठाना था।उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने इस व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए हिमाचल पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ डालने का विरोध किया। मुख्यमंत्री का तर्क था कि किशाऊ बांध के निर्माण में हिमाचल की जमीन का इस्तेमाल होगा और प्रदेश के लोगों को विस्थापन का सामना भी करना पड़ेगा। ऐसे में परियोजना के निर्माण का पूरा वित्तीय बोझ हिमाचल पर डालना उचित नहीं है।
अनूप रतन ने बताया कि किशाऊ बांध को लेकर हुई बातचीत के दौरान मुख्यमंत्री ने हरियाणा के सामने बीबीएमबी में हिमाचल की हिस्सेदारी के मुद्दे पर समर्थन देने की बात भी रखी थी। इसके बाद हरियाणा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अटॉर्नी जनरल ऑफ इंडिया के नोट पर सहमति जताई, जिससे हिमाचल का पक्ष मजबूत हुआ। हालांकि, पंजाब सरकार ने अंतिम समय तक इस मामले में विरोध जारी रखा, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसकी आपत्तियों को स्वीकार नहीं किया।महाधिवक्ता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला हिमाचल के अधिकारों की लंबी कानूनी लड़ाई का परिणाम है। इससे प्रदेश को बिजली के रूप में स्थायी आर्थिक लाभ मिलेगा और आने वाले वर्षों में विकास कार्यों के लिए अतिरिक्त संसाधन जुटाने में मदद मिलेगी।