मोनिका रावत , चंडीगढ़। ईंट भट्ठे के पास करीब दो साल के मासूम को ट्रक से कुचलकर मौत के घाट उतारने के 25 साल पुराने मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने दोषी चालक को राहत देने से इन्कार कर दिया। हाई कोर्ट ने दोषसिद्धि और छह महीने के कठोर कारावास की सजा बरकरार रखते हुए स्पष्ट किया कि मुकदमे में लंबा समय बीत जाना अपने आप में सजा को घटाकर जेल में बिताई गई अवधि तक सीमित करने का आधार नहीं हो सकता।
जस्टिस मंदीप पन्नू ने भगीरथ उर्फ भागी की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। मामला 14 मार्च 2001 का है। भिवानी के पास एक ईंट भट्ठे पर पप्पी और उनकी पत्नी मजदूरी कर रहे थे। उनका करीब दो साल का बेटा ओमबीर पास में खेल रहा था। इसी दौरान ईंट लेने पहुंचे ट्रक चालक ने वाहन को लापरवाही से चलाते हुए बच्चे को कुचल दिया। गंभीर रूप से घायल ओमबीर की अस्पताल ले जाते समय मौत हो गई।
मामले की सुनवाई के दौरान मृतक की मां नीलम अभियोजन की मुख्य और अकेली चश्मदीद गवाह रही। बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि बच्चे के पिता शिकायतकर्ता होने के साथ घटनास्थल पर मौजूद थे, लेकिन उन्हें अदालत में गवाही के लिए पेश नहीं किया गया। इसलिए केवल मां की गवाही के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती। हाई कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया। चालक ने यह भी दलील दी कि ईंट भट्ठे तक जाने वाला रास्ता संकरा था, इसलिए ट्रक तेज गति से नहीं चलाया जा सकता था। अदालत ने स्पष्ट किया कि लापरवाही केवल वाहन की गति से निर्धारित नहीं होती। घटनास्थल, परिस्थितियां और वाहन चलाने का तरीका भी महत्वपूर्ण हैं। भट्ठे पर मजदूरों के परिवार और छोटे बच्चे मौजूद थे, इसलिए भारी वाहन चलाते समय चालक को अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए थी। बच्चे का ट्रक की चपेट में आना और मां की विश्वसनीय गवाही चालक के लापरवाह कृत्य को साबित करने के लिए पर्याप्त थी।
इस मामले में निचली अदालत ने 15 नवंबर 2007 को भगीरथ को भारतीय दंड संहिता की धारा 279 और 304-ए के तहत दोषी ठहराया था। धारा 304-ए में उसे छह महीने के कठोर कारावास के साथ 500 रुपये जुर्माना तथा धारा 279 में 1000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई। इसके बाद 29 अप्रैल 2008 को अपीलीय अदालत ने भी निचली अदालत के फैसले और सजा को बरकरार रखा। इसके बाद वर्ष 2008 में भगीरथ ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दाखिल की।
दोषी ने करीब 25 वर्ष तक मुकदमे का सामना करने और अब तक केवल 18 दिन जेल में रहने का हवाला देते हुए सजा को इसी अवधि तक सीमित करने की मांग की थी। हाई कोर्ट ने इसे स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि दो साल के बच्चे की जान भारी वाहन की लापरवाही से गई है और छह महीने का कठोर कारावास अपराध की गंभीरता के अनुपात में अधिक नहीं है।
अदालत ने दोषसिद्धि तथा छह महीने के कठोर कारावास की सजा बरकरार रखते हुए पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।