Summer express/शिमला/संजू -:एआईसीसी के स्थायी सदस्य और कांग्रेस राष्ट्रीय अध्यक्ष के सलाहकार गुरदीप सिंह सप्पल ने रविवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर केंद्र की मोदी सरकार पर जातिगत जनगणना, बेरोजगारी, शिक्षा और देश के मौजूदा राजनीतिक एवं आर्थिक हालात को लेकर निशाना साधा। सप्पल ने आरोप लगाया कि कांग्रेस के दबाव और जनता की मांग के चलते केंद्र सरकार को जातिगत जनगणना की दिशा में आगे बढ़ना पड़ा है, लेकिन सरकार की नीयत पर अभी भी सवाल खड़े होते हैं। उन्होंने दावा किया कि जातिगत जनगणना को कमजोर करने और इसे असफल बनाने की रणनीति तैयार की जा रही है।
2011 की जनगणना के आंकड़ों पर उठाए सवाल
गुरदीप सिंह सप्पल ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अतीत में जातिगत जनगणना के खिलाफ बयान देते रहे हैं। उन्होंने वर्ष 2011 में हुई सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना यानी SECC का जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि सरकार के पास आंकड़े उपलब्ध होने के बावजूद उन्हें सार्वजनिक नहीं किया गया। सप्पल ने कहा कि सरकार की ओर से स्पेलिंग की गलतियों के कारण बड़ी संख्या में जातियों के सामने आने का तर्क दिया गया, लेकिन यह सिर्फ डेटा जारी नहीं करने का बहाना था।
उन्होंने अरविंद पनगढ़िया कमेटी को लेकर भी सवाल उठाए और कहा कि समिति की बैठक और उसके गठन की प्रक्रिया को लेकर सरकार ने गंभीरता नहीं दिखाई। सप्पल ने मांग की कि आगामी जातिगत जनगणना के फॉर्म में जातियों के नाम पहले से प्रिंट होने चाहिए। उन्होंने तेलंगाना, बिहार और कर्नाटक का उदाहरण देते हुए कहा कि केवल जातियों की संख्या गिनने के बजाय सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति का भी विस्तृत आंकड़ा जुटाया जाना जरूरी है।
ओबीसी आरक्षण के लिए डेटा जरूरी : सप्पल
सप्पल ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि ओबीसी आरक्षण को लेकर वास्तविक और अनुभवजन्य यानी एम्पिरिकल डेटा महत्वपूर्ण है। उनका कहना था कि यदि सरकार पर्याप्त और प्रमाणिक आंकड़े एकत्र नहीं करती है, तो राज्यों में आरक्षण तथा छात्र कल्याण से जुड़ी योजनाओं के सामने कानूनी चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। उन्होंने सरकार से जातिगत जनगणना की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने की मांग की।
2029 से पहले सरकार गिरने का दावा
मोदी सरकार के भविष्य को लेकर भी गुरदीप सिंह सप्पल ने बड़ा राजनीतिक दावा किया। उन्होंने राहुल गांधी के बयान का हवाला देते हुए कहा कि नरेंद्र मोदी की सरकार 2029 तक भी नहीं टिकेगी। सप्पल ने आरोप लगाया कि सरकार अब तक बड़े व्यक्तित्व, जनता में डर का माहौल, बड़े-बड़े सपनों और मीडिया के प्रचार जैसे चार आधारों पर टिकी हुई थी, लेकिन अब इनका प्रभाव लगातार कम हो रहा है।
रोजगार और मैन्युफैक्चरिंग को लेकर निशाना
सप्पल ने देश की अर्थव्यवस्था और रोजगार के मुद्दे पर भी केंद्र सरकार को घेरा। उन्होंने मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की जीडीपी में हिस्सेदारी को लेकर आंकड़े पेश किए और दावा किया कि यह 17 प्रतिशत से घटकर 11.5 प्रतिशत रह गई है। उन्होंने देश में बुनियादी ढांचे को लेकर भी सवाल उठाते हुए कहा कि जमीनी स्थिति सरकार के विकास संबंधी दावों से अलग तस्वीर पेश कर रही है।
शिक्षा महंगी, युवाओं के सामने रोजगार का संकट
शिक्षा और रोजगार के मुद्दे पर सप्पल ने कहा कि उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद भी बड़ी संख्या में युवाओं को रोजगार नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने आईआईटी से पढ़ाई करने वाले युवाओं को लेकर 44 प्रतिशत का आंकड़ा पेश किया। साथ ही एम्स, आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थानों में एससी, एसटी, ओबीसी और ईडब्ल्यूएस वर्गों के प्रोफेसरों के पद खाली होने का दावा किया।उन्होंने निजी शिक्षा की बढ़ती फीस का भी मुद्दा उठाया। सप्पल के मुताबिक, निजी विश्वविद्यालयों में बीए की फीस लाखों रुपये तक पहुंच गई है, जबकि एमबीए और मेडिकल शिक्षा की लागत भी आम परिवारों की पहुंच से बाहर होती जा रही है। उन्होंने कहा कि महंगी शिक्षा के बावजूद रोजगार की गारंटी नहीं है और बड़ी संख्या में युवा डिलीवरी जैसी नौकरियां करने को मजबूर हैं।
गरीब परिवारों पर बढ़ता शिक्षा का बोझ
सप्पल ने कहा कि यदि शिक्षा महंगी होती गई और रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं मिले, तो आने वाले समय में गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाना मुश्किल हो जाएगा। उन्होंने केंद्र सरकार से जातिगत जनगणना को पारदर्शी तरीके से कराने, रोजगार बढ़ाने और शिक्षा को आम लोगों की पहुंच में रखने की मांग की।