समर न्यूज | चंडीगढ़
पंजाब और राजस्थान के बीच नदी जल को लेकर लंबे समय से चल रहा विवाद अब आर्थिक दावे और कानूनी कार्रवाई की दिशा में बढ़ता दिखाई दे रहा है।
पंजाब सरकार ने राजस्थान से 1.44 लाख करोड़ रुपये के कथित बकाये की मांग की है। पंजाब का दावा है कि राजस्थान को सतलुज नदी का पानी उपलब्ध कराने के बदले 1960 के बाद से निर्धारित जल शुल्क या रॉयल्टी का भुगतान नहीं किया गया। राज्य सरकार ने इस दावे को 1960 से 2025 तक की अवधि से जोड़ते हुए 30 दिन के भीतर भुगतान करने की मांग की है और भुगतान नहीं होने पर कानूनी रास्ता अपनाने की चेतावनी दी है। पंजाब सरकार का तर्क है कि इस दावे का आधार चार सितंबर 1920 को हुआ ऐतिहासिक समझौता है।
यह समझौता तत्कालीन ब्रिटिश प्रशासन, पंजाब, बहावलपुर रियासत और बीकानेर रियासत से जुड़ा था। इसके तहत बीकानेर को सिंचाई के लिए सतलुज का पानी उपलब्ध कराया गया था और पानी के इस्तेमाल के बदले शुल्क का प्रावधान था। पंजाब के अनुसार, बीकानेर ने 1960 तक इस व्यवस्था के तहत भुगतान किया, लेकिन इसके बाद भुगतान बंद हो गया, जबकि राजस्थान को नहरों के जरिये पानी मिलता रहा। पंजाब ने मौजूदा दरों के आधार पर अपने दावे की गणना की है। राज्य के अनुसार, 1960 से 2025 तक औसतन करीब एक करोड़ एकड़-फीट पानी के इस्तेमाल को आधार बनाया गया। इसके लिए 141.20 रुपये प्रति एकड़ सालाना की दर का इस्तेमाल किया गया और ब्याज को भी गणना में शामिल किया गया है। पंजाब का कहना है कि ऐतिहासिक समझौते में शुल्क की समीक्षा की गुंजाइश थी, इसलिए पुराने शुल्क को मौजूदा परिस्थितियों के अनुरूप देखा जाना चाहिए।
मुख्यमंत्री भगवंत मान ने इस मुद्दे को राज्य के जल अधिकारों से जोड़ते हुए कहा है कि पंजाब को उसके संसाधन का उचित मूल्य मिलना चाहिए। सरकार का कहना है कि राजस्थान को वर्तमान में भी राजस्थान फीडर और संबंधित नहर प्रणाली के जरिये पंजाब की नदियों का पानी मिलता है। यह पानी राजस्थान के बड़े हिस्से में सिंचाई और पेयजल की जरूरत पूरी करने में इस्तेमाल होता है।
{राजस्थान ने दावे को नकारा
राजस्थान सरकार ने पंजाब के 1.44 लाख करोड़ रुपये के दावे को स्वीकार नहीं किया है। राजस्थान के जल संसाधन मंत्री सुरेश सिंह रावत ने इसे तथ्यात्मक और कानूनी आधार से रहित बताया है। राजस्थान का तर्क है कि 1920 का समझौता ब्रिटिश शासन और तत्कालीन रियासतों के बीच हुआ था तथा स्वतंत्रता के बाद जल बंटवारे को लेकर हुए समझौतों और व्यवस्थाओं ने परिस्थितियों को बदल दिया। राजस्थान की ओर से यह भी कहा गया है कि 1955, 1959 और 1981 के बाद हुए समझौतों में इस तरह की रॉयल्टी का स्पष्ट प्रावधान नहीं है। पंजाब पुराने समझौते की ऐसी व्याख्या कर रहा है, जिसे वर्तमान अंतरराज्यीय जल व्यवस्था पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता।
{कानूनी रास्ते की तैयारी
पंजाब सरकार ने संकेत दिया है कि यदि राजस्थान निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं करता है तो वह न्यायिक रास्ता अपनाएगी। मुख्यमंत्री भगवंत मान पहले ही कह चुके हैं कि मामले को अदालत में ले जाकर पंजाब के पक्ष को रखा जाएगा। ऐसे में विवाद अब केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहने के बजाय कानूनी प्रक्रिया का रूप ले सकता है। हालांकि, 1.44 लाख करोड़ रुपये का दावा अभी पंजाब सरकार का पक्ष है और इसे राजस्थान ने चुनौती दी है। इसलिए इसे राजस्थान पर स्थापित या न्यायिक रूप से तय बकाया राशि के रूप में नहीं देखा जा सकता। अंतिम स्थिति संबंधित समझौतों, जल आवंटन व्यवस्था और दोनों राज्यों के कानूनी दावों की समीक्षा के बाद ही स्पष्ट होगी।
{हरियाणा से भी 312.59 करोड़ मांगे
पंजाब ने हरियाणा से भी भाखड़ा नहर प्रणाली के साझा वाहक चैनलों के संचालन और रखरखाव के लिए 312.59 करोड़ रुपये की मांग की है। इसमें पटियाला स्थित भाखड़ा मुख्य लाइन मंडल से जुड़े करीब 281.78 करोड़ रुपये और मानसा मंडल के करीब 30.80 करोड़ रुपये शामिल बताए गए हैं। पंजाब का कहना है कि हरियाणा की ओर से 2015-16 के बाद से संबंधित रखरखाव खर्च का भुगतान नहीं किया गया।
{अंतरराज्यीय विवाद बढ़ने के संकेत
राजस्थान से पानी की रॉयल्टी की मांग ने पंजाब के अंतरराज्यीय जल विवादों में नया अध्याय जोड़ दिया है। एक तरफ पंजाब पुराने समझौते और जल उपयोग के आधार पर आर्थिक दावा कर रहा है, वहीं राजस्थान मौजूदा कानूनी और संवैधानिक व्यवस्थाओं का हवाला देकर इसे खारिज कर रहा है।