Summer express, मोनिका रावत , चंडीगढ़। हरियाणा पुलिस में पुरुष इंस्पेक्टरों की वर्ष 2008 में हुई भर्ती को लेकर लगभग डेढ़ दशक से चल रही कानूनी लड़ाई में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने चयनित उम्मीदवारों को महत्वपूर्ण राहत प्रदान की है। हाई कोर्ट ने ओएमआर शीट में स्याही फैलने, अभ्यर्थियों के हस्ताक्षर में अंतर और साक्षात्कार में कम अंक देने जैसे आरोपों को चयन प्रक्रिया रद्द करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना। जस्टिस हरसिमरन सिंह सेठी और जस्टिस मिंदरजीत यादव की खंडपीठ ने अमित कुमार और संदीप कुमार की अपीलें खारिज करते हुए एकल पीठ के फैसले में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।
यह मामला हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग द्वारा 22 जुलाई 2008 को जारी विज्ञापन से संबंधित है, जिसमें हरियाणा पुलिस में पुरुष इंस्पेक्टर के 20 पद भरे जाने थे। इनमें से नौ पद सामान्य श्रेणी के थे, जबकि शेष विभिन्न आरक्षित वर्गों के लिए निर्धारित थे। चयन प्रक्रिया में पहले दो प्रश्न पत्रों की लिखित परीक्षा हुई, जिसमें प्रत्येक प्रश्नपत्र 100 अंक का था। अभ्यर्थियों को प्रत्येक में 45 प्रतिशत और कुल 50 प्रतिशत अंक प्राप्त करना अनिवार्य था। लिखित परीक्षा पास करने वाले अभ्यर्थियों को शारीरिक परीक्षा और उसके बाद साक्षात्कार के लिए बुलाया गया।
अमित कुमार ने लिखित और शारीरिक परीक्षा पास करने के बाद 2 जुलाई 2009 को साक्षात्कार दिया। अंतिम परिणाम 8 सितंबर 2010 को घोषित हुआ, जिसमें अमित कुमार 225 में से 152 अंक लेकर प्रतीक्षा सूची में पहले स्थान पर रहे। चयन सूची में स्थान न मिलने पर उन्होंने चयन प्रक्रिया को चुनौती दी। उनका आरोप था कि कुछ चयनित अभ्यर्थियों की ओएमआर शीट में स्याही फैली हुई थी और कुछ पर हस्ताक्षर नहीं थे। उन्होंने प्रतिरूपण की आशंका भी जताई।
हाई कोर्ट ने कहा कि ओएमआर शीट में स्याही फैलने की स्थिति केवल चयनित अभ्यर्थियों के मामले में नहीं थी, बल्कि गैर-चयनित अभ्यर्थियों की शीट में भी ऐसा हुआ था। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कोई ऐसा नियम नहीं है जिसके तहत ओएमआर शीट में स्याही फैलने पर अभ्यर्थी स्वत अयोग्य हो जाता हो। इसके अलावा, जांच में किसी सुनियोजित गड़बड़ी या अनुचित लाभ देने का आरोप साबित नहीं हुआ।
अभ्यर्थियों के हस्ताक्षर में अंतर के आरोप पर भी कोर्ट ने राहत नहीं दी। पीठ ने कहा कि परीक्षा के दौरान अभ्यर्थी की घबराहट के कारण हस्ताक्षर में मामूली अंतर संभव है। प्रतिरूपण साबित करने के लिए कोई वैज्ञानिक प्रमाण पेश नहीं किया गया।
साक्षात्कार में कम अंक देने के आरोप को भी सामान्य माना गया। अदालत ने कहा कि चयन समिति के सदस्य प्रतिष्ठित थे और किसी विशेष सदस्य के खिलाफ पक्षपात का ठोस आरोप नहीं लगाया गया। इस प्रकार, अदालत ने चयन प्रक्रिया को गलत साबित करने का आधार नहीं पाया और दोनों अपीलें खारिज कर दीं।