Summer express, मोनिका रावत , चंडीगढ़। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) की राशि में हेरफेर और उसे दूसरी मद में लगाए जाने की शिकायत के बावजूद कार्रवाई न होने पर पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। हाई कोर्ट ने रोहतक के उपायुक्त को मामले की पूरी स्थिति स्पष्ट करते हुए व्यक्तिगत रूप से शपथ लेकर हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया है। अदालत ने यह भी पूछा है कि वर्ष 2023 में लोकपाल की रिपोर्ट आने और प्रारंभिक जांच में तथ्यों की पुष्टि होने के बावजूद अब तक प्राथमिकी क्यों दर्ज नहीं की गई और जिम्मेदार लोगों पर क्या कार्रवाई हुई।चीफ जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा की खंडपीठ ने यह आदेश रामचंद्र और एक अन्य याचिकाकर्ता की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।
सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर विशेष गौर किया कि मनरेगा योजना के तहत धनराशि के कथित दुरुपयोग या दूसरी जगह लगाए जाने के संबंध में वर्ष 2023 में ही लोकपाल की रिपोर्ट सामने आ चुकी थी। रिपोर्ट में योजना की राशि के डायवर्सन को स्वीकार किया गया था।
इसके अलावा प्रारंभिक जांच रिपोर्ट में भी शिकायत में लगाए गए तथ्यों की पुष्टि की गई थी। इसके बावजूद मामले में न तो प्राथमिकी दर्ज की गई और न ही किसी जिम्मेदार अधिकारी या व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की गई। अदालत ने इस पर गंभीरता जताते हुए जिला प्रशासन से स्थिति स्पष्ट करने को कहा। खंडपीठ ने कहा कि लोकपाल की रिपोर्ट दाखिल होने के बाद काफी समय बीत चुका है। ऐसे में अब रोहतक के उपायुक्त को स्वयं मामले की जांच कर अदालत के समक्ष स्थिति रखनी होगी। इसके लिए अदालत ने उपायुक्त को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है।अदालत ने स्पष्ट किया कि हलफनामे में यह बताया जाना चाहिए कि मनरेगा की राशि के डायवर्सन संबंधी रिपोर्ट के बाद
प्रशासन ने क्या कदम उठाए, प्राथमिकी दर्ज हुई या नहीं और यदि कार्रवाई नहीं हुई तो उसका कारण क्या है।हाई कोर्ट ने रोहतक के उपायुक्त को आदेश की तारीख से दो सप्ताह के भीतर व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने की समयसीमा दी है। मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर को होगी।