Summer express, अंबाला। देश की आजादी की पहली लड़ाई यानी 1857 के विद्रोह में अंबाला की ऐतिहासिक भूमिका को नई पहचान मिलने जा रही है। अंबाला-दिल्ली हाईवे पर करीब 22 एकड़ जमीन में लगभग 800 करोड़ रुपये की लागत से 1857 शहीदी स्मारक तैयार किया गया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह 5 नवंबर को इस स्मारक का लोकार्पण करेंगे। यह स्मारक उन वीर सैनिकों और स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान को समर्पित होगा, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष करते हुए देश की आजादी के लिए अपना जीवन न्योछावर कर दिया।
1857 की क्रांति के इतिहास में अंबाला छावनी का विशेष स्थान रहा है। यहां भारतीय सैनिकों ने अंग्रेज अधिकारियों के आदेशों का विरोध करते हुए विद्रोह का बिगुल बजाया था। उस समय छावनी में अंग्रेजी शासन के खिलाफ असंतोष लगातार बढ़ रहा था। सैनिकों में चर्बी लगे कारतूसों के इस्तेमाल को लेकर भी गहरी नाराजगी थी। उन्हें आशंका थी कि अंग्रेज अधिकारी उन्हें ऐसे कारतूस इस्तेमाल करने के लिए मजबूर करेंगे, जिससे उनकी धार्मिक आस्थाओं को ठेस पहुंचेगी।
ऐतिहासिक दस्तावेजों और पंजाब गजेटियर में दर्ज विवरण के अनुसार, अप्रैल 1857 में अंबाला छावनी में अंग्रेजी सैन्य प्रतिष्ठानों और अधिकारियों से जुड़ी संपत्तियों को निशाना बनाने की कई घटनाएं हुई थीं। 22 अप्रैल को पांचवीं रेजिमेंट नेटिव इन्फैंट्री के मेस परिसर स्थित शिप हाउस में आग लगा दी गई थी। इसके अगले दिन यूरोपीय इन्फैंट्री लाइंस में मेजर लाउटन के अस्तबल में आग लगाने का प्रयास किया गया। 23 अप्रैल को नौवीं लांसर्स लाइंस में कैप्टन साउंडर्स के घर को निशाना बनाने की कोशिश हुई, जबकि 25 अप्रैल को बैंक मास्टर का घर और रेजिमेंट की संपत्ति जला दी गई थी।
इसके बाद 26 अप्रैल को लेफ्टिनेंट एवं राइडिंग मास्टर शा के घर में आग लगाने का प्रयास किया गया। एक मई को पांचवीं रेजिमेंट नेटिव इन्फैंट्री लाइंस में बैजनाथ नामक सिपाही की झोपड़ी भी जला दी गई थी। लगातार हो रही इन घटनाओं से अंग्रेज सैन्य अधिकारियों में चिंता बढ़ गई थी।
इतिहास के अनुसार, अंग्रेजी हुकूमत ने विद्रोह को दबाने के लिए बड़े स्तर पर सैन्य संसाधन जुटाए थे। इसके लिए अंबाला से 500 ऊंट और 500 बैलगाड़ियों का इंतजाम किया गया था, ताकि सेना को रसद और अन्य जरूरी सामान पहुंचाया जा सके। दूसरी ओर भारतीय सैनिकों में अंग्रेजी शासन के प्रति असंतोष बढ़ता जा रहा था।
पंजाब गजेटियर के मुताबिक, 7 और 8 मई को अंग्रेज अधिकारियों को सैनिकों के बीच विद्रोह की योजना बनने की सूचनाएं मिली थीं। 10 मई को पांचवीं और 60वीं भारतीय पैदल सेना रेजिमेंट के सैनिक बैरकों में पहुंचे और अपनी बंदूकें निकालकर उनमें गोलियां भरनी शुरू कर दीं। खजाने की सुरक्षा में तैनात 60वीं रेजिमेंट के जवानों ने भी हथियारों के साथ मोर्चा संभाल लिया था। सैनिकों ने अंग्रेज अधिकारियों के आदेश मानने से इनकार कर दिया था। बाद में विद्रोह में शामिल कई सैनिकों के खिलाफ कार्रवाई की गई।
हरियाणा के ऊर्जा, परिवहन एवं श्रम मंत्री अनिल विज ने भी 1857 के संग्राम से जुड़े ऐतिहासिक दस्तावेजों का हवाला देते हुए अंबाला की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया है। उनका कहना है कि अंबाला के योगदान से जुड़े प्रमाण सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हैं। करीब 800 करोड़ रुपये की लागत से बना यह शहीदी स्मारक इसी ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित करने और आने वाली पीढ़ियों को स्वतंत्रता संग्राम के वास्तविक इतिहास से परिचित कराने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है।