हिमाचल प्रदेश के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित स्वास्थ्य संस्थान आईजीएमसी शिमला को लेकर आम लोगों के मन में कई सवाल रहते हैं। कोई यहां इलाज की उम्मीद लेकर आता है, तो कोई कठिन समय में अंतिम भरोसे के रूप में इस अस्पताल का रुख करता है।
द समर न्यूज हिमाचल के वरिष्ठ संपादक मोहित प्रेम शर्मा ने आईजीएमसी के मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. राहुल राव से विशेष बातचीत में अस्पताल की यात्रा, आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं, चुनौतियों और सामाजिक जिम्मेदारी पर विस्तार से बात की। प्रस्तुत हैं इस साक्षात्कार के प्रमुख अंश:-
सवाल: आईजीएमसी को हिमाचल का सबसे बड़ा और प्रतिष्ठित अस्पताल कहा जाता है। यहां तक पहुंचने के लिए आपकी यात्रा कैसी रही?
जवाब: आईजीएमसी केवल हिमाचल ही नहीं, बल्कि उत्तर भारत का एक प्रतिष्ठित संस्थान है। यह करीब 70 साल पुराना संस्थान है और हिमाचल की आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं का आधार माना जाता है। 1994 में एमबीबीएस की पढ़ाई की और 2001 में सरकारी सेवा में आया। इसके बाद उन्होंने सिरमौर, मंडी और शिमला सहित विभिन्न क्षेत्रों में सेवाएं दीं। बाद में अस्पताल प्रशासन में विशेषज्ञता हासिल की और आईजीएमसी में डिप्टी मेडिकल सुपरिटेंडेंट के तौर पर काम करने का अवसर मिला। करीब 10 साल डिप्टी मेडिकल सुपरिटेंडेंट के रूप में और पिछले लगभग चार साल से मेडिकल सुपरिटेंडेंट के पद पर सेवाएं दी हैं।
सवाल: कई बार मरीजों की शिकायत रहती है कि डॉक्टरों का व्यवहार ठीक नहीं होता। आप इसे कैसे देखते हैं?
जवाब: डॉक्टर भी समाज का हिस्सा हैं और वे भगवान नहीं, बल्कि इंसान हैं। डॉक्टरों की कोशिश रहती है कि वे 24 घंटे और सातों दिन पूरी जिम्मेदारी से सेवाएं दें। आईजीएमसी जैसे बड़े संस्थान में डॉक्टरों पर भारी दबाव रहता है। यहां केवल इलाज ही नहीं होता, बल्कि मेडिकल छात्रों और पैरामेडिकल स्टाफ की ट्रेनिंग भी होती है। कई बार काम के लंबे घंटे, मरीजों की बड़ी संख्या और गंभीर मामलों के कारण तनाव बढ़ जाता है। हालांकि मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू द्वारा डॉक्टरों की ड्यूटी को आठ घंटे से अधिक न रखने की दिशा में निर्देश देना एक सकारात्मक कदम है।
सवाल: चमियाणा अस्पताल को लेकर लोगों में भ्रम रहता है। हार्ट या अन्य इमरजेंसी में मरीज कहां जाएं?
जवाब: लोगों को भ्रमित होने की जरूरत नहीं है। चमियाणा अस्पताल आईजीएमसी का ही हिस्सा है। कई सुपर स्पेशियलिटी ओपीडी वहां चलती हैं, लेकिन आईजीएमसी में भी इंटर-डिपार्टमेंटल सेवाएं उपलब्ध हैं। अगर कोई मरीज मुख्य आईजीएमसी में आता है, तो उसे वापस नहीं भेजा जाता। जरूरत पड़ने पर संबंधित विभाग के डॉक्टर मरीज को देखते हैं और आवश्यकता अनुसार उसे चमियाणा रेफर किया जाता है। चमियाणा नया संस्थान है और वहां सुविधाएं धीरे-धीरे बढ़ाई जा रही हैं। इमरजेंसी सेवाएं भी शुरू की गई हैं, लेकिन मरीजों को यह चिंता नहीं करनी चाहिए कि गलत जगह पहुंचने पर इलाज नहीं मिलेगा।
सवाल: अक्सर बड़े नेता और अधिकारी इलाज के लिए बाहर जाते हैं। क्या उन्हें आईजीएमसी पर भरोसा नहीं?
जवाब: जब वीरभद्र सिंह अपने अंतिम दिनों में आईजीएमसी में उपचाराधीन थे, तब उन्हें बाहर शिफ्ट करने की बात भी आई, लेकिन उन्होंने आईजीएमसी पर भरोसा जताया और कहा कि यह संस्थान उन्होंने बनाया है और उन्हें इस पर पूरा विश्वास है। यह आईजीएमसी की विश्वसनीयता का बड़ा प्रमाण है।
सवाल: मरीजों की मदद करने की प्रेरणा आपको कहां से मिली?
जवाब: आईजीएमसी से मेरा भावनात्मक रिश्ता भी है, क्योंकि मेरा जन्म भी इसी संस्थान से जुड़े केएनएच में हुआ था। बहुत कम लोगों को उस स्थान पर सेवा करने का मौका मिलता है, जहां उनका जन्म हुआ हो। अस्पताल में आने वाला हर व्यक्ति मजबूरी में आता है। अमीर-गरीब का फर्क अस्पताल के दरवाजे पर खत्म हो जाता है। हर मरीज उम्मीद लेकर आता है और जब उसकी मदद हो पाती है, तो डॉक्टर और प्रशासनिक टीम को भी संतुष्टि मिलती है कि वे समाज को कुछ वापस दे पा रहे हैं।
सवाल: आईजीएमसी में आज कौन-कौन सी आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं?
जवाब: आईजीएमसी की शुरुआत करीब 300 बेड से हुई थी, जबकि आज यह करीब 1100 बेड वाला बड़ा अस्पताल है। समय के साथ यहां कई सुपर स्पेशियलिटी सेवाएं जुड़ी हैं। कार्डियोलॉजी, कार्डियोथोरेसिक सर्जरी, कैंसर उपचार, यूरोलॉजी, गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी, मेडिसिन, सर्जरी और ट्रॉमा जैसी सेवाएं उपलब्ध हैं। आईजीएमसी में लेवल-वन ट्रॉमा सेंटर कार्यरत है, जो पूरे हिमाचल में बेहद महत्वपूर्ण सुविधा है। पहले कई जांचों और इलाज के लिए मरीजों को पीजीआई, एम्स या निजी अस्पतालों में जाना पड़ता था, लेकिन अब कई आधुनिक सुविधाएं हिमाचल में ही उपलब्ध हैं।
सवाल: क्या आईजीएमसी में डॉक्टरों और स्टाफ की कमी है?
जवाब: डॉक्टरों के मामले में आईजीएमसी की स्वीकृत पोस्ट लगभग भरी हुई हैं। फैकल्टी की संख्या भी पर्याप्त है। हालांकि नर्सिंग और पैरामेडिकल स्टाफ में कुछ कमी है। उन्होंने कहा कि करीब डेढ़ सौ से दो सौ नर्सिंग पद खाली हैं, लेकिन सरकार ने भर्ती प्रक्रिया के माध्यम से इन्हें भरने का भरोसा दिया है। पहले अस्पताल लगभग 40 प्रतिशत मैनपावर पर चल रहा था, जबकि अब यह क्षमता बढ़कर करीब 75 प्रतिशत तक पहुंच गई है। अभी भी कुछ कमी है, लेकिन स्थिति पहले से बेहतर हुई है।
सवाल: समाज में आत्महत्या और नशे के मामले बढ़ रहे हैं। आप इसे कैसे देखते हैं?
जवाब: पहले संयुक्त परिवारों में लोग एक-दूसरे से बात करते थे, परिवार के सदस्य साथ बैठते थे और बच्चों पर सामूहिक ध्यान रहता था। अब मोबाइल, व्यस्त जीवनशैली और परिवारों में संवाद की कमी ने एक खालीपन पैदा कर दिया है। बच्चे और माता-पिता दोनों अपने-अपने मोबाइल में व्यस्त हैं। नशे के मामलों में भी कई बार परिवार शुरुआती संकेतों को स्वीकार नहीं करते। अगर डॉक्टर माता-पिता को बताते हैं कि बच्चे में नशे की लत के संकेत हैं, तो कई परिवार इसे मानने को तैयार नहीं होते। इस समस्या का समाधान केवल सरकार या अस्पताल नहीं कर सकते। यह पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
सवाल: क्या समाजसेवा का भाव आपके परिवार से भी जुड़ा है?
जवाब: मेरे परिवार में सेवा और प्रशासन दोनों का माहौल रहा है। दादा राजा राम राव समाजसेवा के कार्यों से जुड़े रहे। वे जरूरतमंद परिवारों की मदद करते थे, लड़कियों की शादी और शिक्षा में सहयोग करते थे। पिता डॉ. एनसी राव का भी चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में योगदान रहा और डेंटल कॉलेज की स्थापना की सोच में उनकी अहम भूमिका रही। माता डॉ. अनीता राव हिमाचल प्रदेश में शिक्षा निदेशक रहीं। इसके अलावा ताया रंगीला राम राव लंबे समय तक राजनीति और जनसेवा से जुड़े रहे। परिवार से मिले इन्हीं संस्कारों ने उन्हें अस्पताल प्रशासन के माध्यम से समाजसेवा करने की प्रेरणा दी।
सवाल: नई मशीनों और तकनीक से मरीजों को क्या लाभ मिल रहा है?
जवाब: पहले आईजीएमसी में सीमित संख्या में एमआरआई, सीटी स्कैन और अल्ट्रासाउंड जैसी सुविधाएं थीं, जिसके कारण मरीजों को लंबा इंतजार करना पड़ता था। अब 3 टेस्ला एमआरआई जैसी आधुनिक मशीन उपलब्ध है। सीटी स्कैन की सुविधा बढ़ाई गई है। पेट स्कैन की सुविधा शुरू होने से कैंसर मरीजों को बड़ी राहत मिली है। उन्होंने बताया कि निजी क्षेत्र में पेट स्कैन के लिए 20 से 25 हजार रुपये तक खर्च करने पड़ते थे, जबकि आईजीएमसी में यह सुविधा कम दरों पर उपलब्ध करवाई जा रही है। कुछ महीनों में ही सैकड़ों मरीज इसका लाभ ले चुके हैं। इसी तरह रोबोटिक सर्जरी भी अब सरकारी क्षेत्र में उपलब्ध हो रही है, जो पहले केवल बड़े निजी अस्पतालों में सपना जैसी लगती थी।
सवाल: हिमाचल की स्वास्थ्य सेवाओं को आप किस तरह देखते हैं?
जवाब: हिमाचल प्रदेश का सरकारी स्वास्थ्य ढांचा बहुत मजबूत है। उनके अनुसार, कई राज्यों की तुलना में हिमाचल में लोग सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर अधिक भरोसा करते हैं। प्रदेश में मेडिकल कॉलेजों, सिविल अस्पतालों, पीएचसी और सब सेंटरों का मजबूत नेटवर्क है। जनसंख्या के अनुपात में हिमाचल में स्वास्थ्य संस्थानों की उपलब्धता महत्वपूर्ण है। चुनौतियां जरूर हैं, लेकिन सरकारी क्षेत्र में हिमाचल की स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर स्थिति में हैं।
सवाल: क्या राजनीति में आने की कोई इच्छा है?
जवाब: अपनी वर्तमान जिम्मेदारी से खुश हूं। मेरा काम अस्पताल को बेहतर ढंग से चलाना, सफाई व्यवस्था, नर्सिंग केयर, मरीजों की सुविधा और प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करना है। अस्पताल प्रशासन में उनकी पढ़ाई और अनुभव का उपयोग हो रहा है। मेरे पास रोज ऐसे लोग आते हैं, जिनके पास पैसे नहीं होते या जिन्हें इलाज की प्रक्रिया में मदद चाहिए होती है। ऐसे लोगों को राहत दिला पाना ही उनके लिए सबसे बड़ा संतोष है।