Summer express, मोनिका रावत , मोहाली | सेक्टर 65 की 42 एकड जमीन की धोखाधड़ी में अदालत ने आरोपितों को गिरफ्तार करने के आदेश दिए है। अदालत ने आदर्श गर्ग, परवीन गर्ग तथा वेद प्रकाश गर्ग की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। अदालत ने अपने आदेश में इसे एक गंभीर मामला बताते हुए आरोपितों की हिरासत में लेकर पूछताछ करने की कहा है। ट्राइसिटी में जमीन की धोखाधड़ी का सबसे बड़ा मामला सामने आया था। मोहाली सेक्टर 65 में पार्टनरशिप फर्म बनाकर 42 एकड कमर्शियल जमीन हथियाने की शिकायत पंचकूला सेक्टर 6 निवासी निवासी शिव अग्रवाल ने की थी।
मोहाली की जिला अदालत ने आरोपित वेद प्रकाश गर्ग, परवीन गर्ग और आदर्श गर्ग को राहत देने से इनकार कर दिया। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश हरदीप सिंह की अदालत ने अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि मामले में लगाए गए आरोप गंभीर प्रकृति के हैं और निष्पक्ष जांच के लिए आरोपित से हिरासत में पूछताछ आवश्यक है।
मामला थाना सोहाना में दर्ज कैसे से जुड़ा है, जिसमें भारतीय दंड संहिता की धोखाधड़ी, जालसाजी, आपराधिक विश्वासघात और आपराधिक षड्यंत्र से संबंधित धाराएं लगाई गई हैं।
51 एकड़ जमीन के सौदे को लेकर विवाद
एफआईआर के अनुसार शिकायतकर्ताओं और आरोपितों के बीच 14 मार्च 2022 को एमओयू (मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग) हुआ था। इसमें डी.एस. बिल्डटेक फर्म में शिकायतकर्ताओं की हिस्सेदारी खरीदने का समझौता किया गया था। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि प्रति एकड़ 4.27 करोड़ रुपये की दर से सौदा तय हुआ था और करोड़ों रुपये का भुगतान किया जाना था, लेकिन आरोपितों ने तय रकम का एक भी रुपया नहीं दिया।
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि आरोपितों ने विश्वास का फायदा उठाकर एमओयू पर हस्ताक्षर करवा लिए और बाद में उसी के आधार पर साझेदारी और कारोबार पर कब्जा करने की कोशिश की। आरोप है कि एमओयू में कई गंभीर विसंगतियां हैं, चेक नंबर गलत दर्ज किए गए हैं, भुगतान का दावा किया गया जबकि कोई भुगतान हुआ ही नहीं और समझौते का एक महत्वपूर्ण पैरा भी दस्तावेज में मौजूद नहीं है।
अदालत ने माना जांच के लिए हिरासत जरूरी
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने दलील दी कि मामला पूरी तरह दीवानी प्रकृति का है और शिकायत में जालसाजी के स्पष्ट आरोप नहीं हैं। वहीं राज्य सरकार और शिकायतकर्ता की ओर से कहा गया कि आरोपितों ने पहले साझेदारी का विश्वास हासिल किया और बाद में दस्तावेजों का दुरुपयोग कर नई फर्म बनाकर पुरानी फर्म का कारोबार दूसरी कंपनी में स्थानांतरित कर दिया।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने कहा कि पूरे मामले का केंद्र एमओयू और उससे जुड़े दस्तावेज हैं। आरोपितों के खिलाफ प्रथम दृष्टया गंभीर आरोप सामने आते हैं और मामले की तह तक पहुंचने के लिए उनकी कस्टोडियल इंटरोगेशन (हिरासत में पूछताछ) आवश्यक है। इसी आधार पर अदालत ने अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी।
बैक-डेटेड डीड बनाकर हिस्सेदारी ट्रांसफर करने का आरोप
शिव अग्रवाल का आरोप है कि एमओयू, पार्टनरशिप डीड और डिसॉल्यूशन डीड पर एक साथ हस्ताक्षर करवाकर दस्तावेज एक मध्यस्थ के पास रखे गए थे। बाद में उनकी जानकारी के बिना इन दस्तावेजों को रजिस्ट्रार कार्यालय में पेश कर फर्म में 45 प्रतिशत हिस्सेदारी ट्रांसफर करवा ली गई। शिकायत के अनुसार, आरोपियों ने 1 अप्रैल 2022 की बैक-डेटेड पार्टनरशिप डीड तैयार कर शिकायतकर्ता को फर्म से बाहर दिखा दिया और बाद में नई फर्म बनाकर पुरानी कंपनी के नाम खरीदी गई जमीनों को नई कंपनी में स्थानांतरित करने का प्रयास किया।
जांच में सामने आईं गड़बड़ी
पुलिस जांच के दौरान शिकायतकर्ता, आरोपियों, गवाहों और रजिस्ट्रार कार्यालय के रिकॉर्ड की जांच की गई। जांच में एमओयू, पार्टनरशिप डीड और डिसॉल्यूशन डीड की तारीखों में अंतर पाया गया। पुलिस के अनुसार, 1 अप्रैल 2022 की पार्टनरशिप डीड संदिग्ध प्रतीत हुई, क्योंकि इसके बाद भी अक्टूबर 2022 तक फर्म के नाम पर जमीनों की रजिस्ट्रियां होती रहीं। इसके अलावा शिकायतकर्ता की पूंजी को उनकी सहमति के बिना फर्म की बैलेंस शीट में ‘अनसिक्योर्ड लोन’ के रूप में दर्शाने का भी आरोप लगाया गया है।