एजेंसी। नई दिल्ली
भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने संविधान को देश की सबसे बड़ी ताकत बताते हुए कहा है कि न्यायपालिका का काम किसी व्यक्ति, संस्था या राजनीतिक पक्ष के समर्थन अथवा विरोध में फैसला करना नहीं, बल्कि संविधान और कानून के आधार पर ही न्याय सुनिश्चित करना है।
उन्होंने न्यायिक संस्थाओं की स्वतंत्रता के साथ-साथ उनके लिए निर्धारित संवैधानिक सीमाओं के सम्मान को भी जरूरी बताया है। इससे पहले स्टॉकहोम में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भी उन्होंने कहा था कि विधि का शासन सत्ता के मनमाने इस्तेमाल पर अंकुश लगाता है और नागरिकों को कानून के समक्ष समानता देता है। सीजेआई ने न्यायपालिका के सामने लंबित मामलों की बड़ी संख्या को चुनौती बताते हुए इनके शीघ्र निपटारे के लिए विशेष योजना पर भी जोर दिया है। संविधान पीठों के लंबित मामलों को तेजी से सुनने के लिए दोपहर बाद अलग समय निर्धारित करने का प्रस्ताव सामने आया है। इसके तहत संविधान पीठ से जुड़े 29 लंबित मामलों को प्राथमिकता के साथ सुनने के लिए प्रतिदिन दो घंटे की अतिरिक्त सुनवाई का सुझाव दिया गया है।
संविधान और न्यायिक स्वतंत्रता पर जोर
सीजेआई इससे पहले भी कह चुके हैं कि न्यायिक समीक्षा को न्यायपालिका की सर्वोच्चता के रूप में नहीं, बल्कि संविधान की रक्षा की जिम्मेदारी के रूप में देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार, स्वतंत्र न्यायपालिका संविधान की सर्वोच्चता की महत्वपूर्ण संरक्षक है, लेकिन न्यायपालिका को भी अपनी संस्थागत सीमाओं का सम्मान करना चाहिए। नालसार प्रकरण में छात्रों के विरोध के अधिकार को लेकर सीजेआई का रुख ऐसे समय आया है, जब न्यायपालिका, विधि संस्थानों और छात्रों के बीच संवाद तथा असहमति के अधिकार को लेकर बहस तेज है। अदालत की टिप्पणी का व्यापक संदेश यही है कि संवैधानिक संस्थाओं में असहमति के लिए जगह होनी चाहिए और विवादों का समाधान दंडात्मक कार्रवाई के बजाय संवाद से तलाशा जाना चाहिए।