लक्की भट्टी | लुधियाना
समर न्यूज
सिद्ध पीठ महाबली संकटमोचन श्री हनुमान मंदिर, शंकराचार्य नगर, जोशी नगर धाम, हैबोवाल कलां में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा अंतर्गत श्री कृष्ण कथा मंदिर प्रांगण में बने दिव्य पंडाल में श्रद्धा एवं भक्ति भाव के साथ जारी है।
मंदिर प्रधान अमन जैन, चेयरमैन ऋषि जैन एवं उपप्रधान अनुज मदान की अध्यक्षता में आयोजित इस दिव्य कथा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचकर भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का श्रवण कर आध्यात्मिक आनंद प्राप्त कर रहे हैं। हमीरपुर, हिमाचल प्रदेश स्थित सिंदूरी माता मंदिर से पधारे कथा व्यास स्वामी श्री प्रफुल जी महाराज ने श्रीमद्भागवत कथा के विभिन्न प्रसंगों का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए कहा कि भगवान श्रीकृष्ण की प्रत्येक लीला केवल मनोरंजन की कथा नहीं, बल्कि मानव जीवन को सही दिशा देने वाली आध्यात्मिक शिक्षा है। उन्होंने कथा का आरंभ सकट भंजन प्रसंग से किया और बताया कि भगवान अपने भक्तों के जीवन से संकटों का निवारण करने वाले हैं। सकटासुर प्रसंग के माध्यम से उन्होंने समझाया कि मनुष्य के जीवन में जमा हुआ अहंकार, जड़ता और नकारात्मकता भी एक प्रकार का भार है, जिसे भगवान के स्मरण और सद्कर्मों से दूर किया जा सकता है।
स्वामी जी ने सकटासुर वध का गूढ़ रहस्य बताते हुए कहा कि बाहरी राक्षसों से अधिक मनुष्य को अपने भीतर मौजूद विकारों से संघर्ष करना पड़ता है। अहंकार, लोभ, क्रोध, मोह और ईर्ष्या जैसे विकार मनुष्य की आध्यात्मिक उन्नति में बाधा बनते हैं। कलियुग में भी इस प्रसंग का महत्व इसलिए है क्योंकि आधुनिक जीवन में तनाव और भौतिक प्रतिस्पर्धा के बीच मनुष्य अपने भीतर के संतुलन को खो रहा है। भगवान का स्मरण उसे पुनः सकारात्मकता की ओर ले जाता है।
इसके बाद कथा व्यास ने मनसा तीन एवं तृणावर्त राक्षस प्रसंग का वर्णन करते हुए बताया कि तृणावर्त का प्रतीक जीवन में उठने वाला वह अहंकार और मानसिक तूफान है, जो मनुष्य को वास्तविकता से दूर कर देता है। उन्होंने कहा कि जब मनुष्य अपनी शक्ति, धन, पद और प्रतिष्ठा पर अहंकार करने लगता है तो उसका विवेक प्रभावित होने लगता है। भगवान श्रीकृष्ण की शरण ही मनुष्य को ऐसे मानसिक तूफानों से बचाकर स्थिरता प्रदान करती है।
नामकरण लीला का वर्णन करते हुए स्वामी श्री प्रफुल जी महाराज ने बताया कि कान्हा के 100 दिन के हो जाने के बाद भी उनका नामकरण संस्कार नहीं हुआ था। उन्होंने इस प्रसंग के माध्यम से संस्कारों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारतीय सनातन परंपरा में जीवन के प्रत्येक चरण को संस्कारों से जोड़ा गया है। नाम केवल पहचान नहीं, बल्कि व्यक्ति के जीवन में एक सकारात्मक संकल्प और संस्कार का प्रतीक भी माना गया है।इसके पश्चात रमणीक राक्षस प्रसंग के माध्यम से स्वामी जी ने श्रद्धालुओं को संदेश दिया कि भगवान अपने भक्तों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। उन्होंने कहा कि विपरीत परिस्थितियां मनुष्य को डराने के लिए नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपी शक्ति को पहचानने का अवसर देती हैं।कथा के दौरान कालिया नाग प्रसंग ने श्रद्धालुओं को विशेष आध्यात्मिक संदेश दिया। स्वामी जी ने कहा कि कालिया नाग केवल एक पौराणिक पात्र नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर मौजूद विषैले विचारों, द्वेष और अहंकार का प्रतीक भी है। भगवान श्रीकृष्ण का कालिया नाग के फनों पर नृत्य करना इस बात का प्रतीक है कि जब ईश्वर की कृपा और धर्म का प्रकाश जीवन में आता है तो नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव समाप्त होने लगता है। आज कलियुग में भी यह प्रसंग मनुष्य को अपने विचारों को शुद्ध करने और क्रोध, ईर्ष्या तथा द्वेष से दूर रहने की प्रेरणा देता है।
इसके उपरांत स्वामी श्री प्रफुल जी महाराज ने गिरिराज लीला एवं गोवर्धन प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी अंगुली पर उठाकर केवल ब्रजवासियों की रक्षा ही नहीं की, बल्कि संसार को प्रकृति, गौवंश और पर्यावरण के सम्मान का संदेश भी दिया। गोवर्धन पूजा हमें यह सिखाती है कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और उसका संरक्षण मानव जीवन का महत्वपूर्ण धर्म है।
उन्होंने कहा कि गोवर्धन लीला में एक और गहरा संदेश छिपा है—मनुष्य को अहंकार छोड़कर भगवान की शरण ग्रहण करनी चाहिए। इंद्र के अभिमान का अंत और श्रीकृष्ण द्वारा ब्रजवासियों की रक्षा यह बताती है कि पद, शक्ति और प्रतिष्ठा का अहंकार कभी स्थायी नहीं होता। सच्ची शक्ति सेवा, विनम्रता और ईश्वर के प्रति समर्पण में है।
स्वामी जी ने अपने प्रेरणादायक उपदेशों में कहा कि कलियुग में भगवान का नाम-स्मरण, सत्संग, कथा श्रवण, सेवा और परोपकार ही मनुष्य के जीवन को शांति प्रदान करने के सरल साधन हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि बच्चों को बचपन से ही संस्कारों से जोड़ें, माता-पिता का सम्मान करें, गौसेवा एवं जरूरतमंदों की सेवा करें ।
स्वामी श्री प्रफुल जी महाराज ने कहा कि श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं को केवल सुनना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके संदेश को अपने व्यवहार में उतारना आवश्यक है। यदि मनुष्य अपने भीतर के ‘सकटासुर’ रूपी विकार, ‘तृणावर्त’ रूपी अहंकार और ‘कालिया’ रूपी विषैले विचारों को समाप्त कर दे तथा गोवर्धन लीला से विनम्रता, प्रकृति प्रेम और ईश्वर पर विश्वास का संदेश ग्रहण करे तो उसका जीवन निश्चित रूप से सुख, शांति और सद्भाव से भर सकता है।इस अवसर पर मंदिर के प्रधान अमन जैन ,चेयरमैन ऋषि जैन व उपप्रधान अनुज मदान ने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा में भगवान श्रीकृष्ण की प्रत्येक लीला मानव जीवन के लिए मार्गदर्शक है। सकटासुर हमें विकारों से मुक्त होने, तृणावर्त अहंकार और भ्रम से बचने, कालिया नाग प्रसंग नकारात्मकता को समाप्त करने तथा गोवर्धन लीला विनम्रता, प्रकृति प्रेम और भगवान पर विश्वास रखने की प्रेरणा देती है।
अनुज मदान ने कहा कि आज के भागदौड़ भरे कलियुग में युवा पीढ़ी और बच्चों को अपनी सनातन संस्कृति एवं धार्मिक ग्रंथों से जोड़ना समय की आवश्यकता है। श्रीमद्भागवत कथा जैसे आयोजनों के माध्यम से परिवारों में संस्कार और समाज में भाईचारे की भावना मजबूत होती है। उन्होंने कथा में पहुंच रहे सभी श्रद्धालुओं का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि मंदिर समिति भविष्य में भी ऐसे धार्मिक एवं सामाजिक आयोजनों को निरंतर आगे बढ़ाती रहेगी।