नई दिल्ली | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया दो दिवसीय मालदीव यात्रा (25-26 जुलाई 2025) ने न सिर्फ दोनों देशों के रिश्तों को नई मजबूती दी, बल्कि दक्षिण एशिया की बदलती भू-राजनीति में भारत की रणनीतिक स्थिति को भी और सुदृढ़ किया है। यह मुइज़्ज़ू के राष्ट्रपति बनने के बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली यात्रा थी, जिसने संकेत दिया कि बीते तनाव अब अतीत की बात हो चुके हैं।
बदले हालात, नई शुरुआत
2013-2018 के बीच राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन के कार्यकाल में भारत और मालदीव के रिश्तों में तनातनी आई थी। उनके उत्तराधिकारी मोहम्मद मुइज़्ज़ू की शुरुआती चीन-झुकाव वाली नीति और ‘इंडिया आउट’ अभियान ने संबंधों को और उलझा दिया था। लेकिन अगस्त 2024 में विदेश मंत्री एस जयशंकर की यात्रा और फिर मुइज़्ज़ू की भारत यात्रा के बाद स्थिति में बड़ा बदलाव आया। अब प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा ने इस बदलाव को स्थायी रंग दिया।
मालदीव ने दिखाई मेहमाननवाज़ी, भारत ने दिखाया भरोसा
प्रधानमंत्री मोदी के आगमन पर खुद राष्ट्रपति मुइज़्ज़ू और उनके मंत्री स्वागत के लिए एयरपोर्ट पहुंचे। मोदी मालदीव की स्वतंत्रता की 60वीं वर्षगांठ समारोह में मुख्य अतिथि रहे। इससे साफ हो गया कि दोनों देश फिर से एक-दूसरे के भरोसेमंद साझेदार बन चुके हैं।
4850 करोड़ की मदद और बड़े ऐलान
भारत ने मालदीव को 4850 करोड़ रुपये की नई क्रेडिट लाइन देने का ऐलान किया, साथ ही पुराने कर्ज की शर्तें आसान की गईं। इसके अलावा:
- मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर बातचीत शुरू करने की सहमति।
- 6 विकास परियोजनाओं की शुरुआत – जिनमें सामाजिक आवास, स्वास्थ्य और सामुदायिक विकास से जुड़ी योजनाएं शामिल हैं।
- 8 समझौता ज्ञापनों (MoUs) पर हस्ताक्षर – डिजिटल, मत्स्य पालन, फार्मा, मौसम विज्ञान जैसे क्षेत्रों में सहयोग।
- भारत-मालदीव रिश्तों की 60वीं वर्षगांठ पर स्मारक डाक टिकट जारी।
जनता से सीधा जुड़ाव और विपक्ष से मुलाकात
पीएम मोदी ने सिर्फ सरकार से ही नहीं, बल्कि मालदीव के विपक्षी नेताओं, व्यापारियों, भारतीय प्रवासियों और छात्रों से भी मुलाकात की। इसने स्पष्ट संकेत दिया कि भारत सिर्फ सरकारों से नहीं, बल्कि आम जनता से रिश्तों को अहमियत देता है।
दक्षिण एशिया में भारत की रणनीति और चीन को संतुलन
भारत ने इस यात्रा के जरिए यह संदेश दिया कि वह अपने पारंपरिक प्रभाव क्षेत्र में किसी बाहरी शक्ति – विशेष रूप से चीन – को हावी नहीं होने देगा। अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे साझेदारों के साथ भारत का सहयोग इस रणनीति को मजबूती देगा। खासकर द्वीपीय देशों में भारत की सक्रियता अब अनिवार्य हो चुकी है।