नई दिल्ली। अफगानिस्तान में तालिबान सरकार के नए कानूनी फैसले ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर चिंता पैदा कर दी है। तालिबान प्रशासन ने नया क्रिमिनल प्रोसीजर कोड लागू किया है, जिसमें गुलामी जैसी प्रथा को कानूनी मान्यता देने और धार्मिक नेताओं को कानून से ऊपर रखने के प्रावधान शामिल हैं। इस फैसले के बाद मानवाधिकार संगठनों और वैश्विक समुदाय में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
तालिबान के सर्वोच्च नेता मुल्ला हिबतुल्लाह अखुंदजादा ने 58 पन्नों वाले इस नए कानून को मंजूरी दी है और इसे देश की सभी अदालतों में लागू करने का आदेश दिया गया है। कानून में स्पष्ट प्रावधान है कि यदि कोई मौलवी या धार्मिक नेता किसी अपराध में संलिप्त पाया जाता है, तो उसके खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज नहीं होगा। ऐसे मामलों में सजा की बजाय केवल ‘सलाह’ देने की व्यवस्था रखी गई है, जिसे कानून के समक्ष समानता के सिद्धांत के खिलाफ माना जा रहा है।
नए कानून के आर्टिकल-9 के तहत अफगान समाज को चार कानूनी वर्गों में विभाजित किया गया है—उलेमा (धार्मिक नेता), अशराफ (उच्च वर्ग), मध्यम वर्ग और निचला वर्ग व गुलाम। कानून में ‘गुलाम’ और ‘मालिक’ जैसे शब्दों का खुले तौर पर उपयोग किया गया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि गुलामी को एक वैध सामाजिक श्रेणी के रूप में स्वीकार किया गया है।
मानवाधिकार संगठन रवादारी के अनुसार, निचले वर्ग या गुलाम श्रेणी के व्यक्ति द्वारा अपराध किए जाने पर जेल के साथ शारीरिक दंड का भी प्रावधान है, जबकि इसी अपराध में मौलवियों को किसी प्रकार की सजा नहीं दी जाएगी। यह असमान दंड व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के विपरीत बताई जा रही है।
इसके अलावा, कानून में शारीरिक हिंसा की परिभाषा को भी सीमित कर दिया गया है। रिपोर्टों के मुताबिक, जब तक हड्डी न टूटे या त्वचा न फटे, तब तक उसे हिंसा नहीं माना जाएगा। यहां तक कि पिता को 10 वर्षीय बच्चे को धार्मिक कर्तव्यों में लापरवाही पर शारीरिक दंड देने की अनुमति दी गई है।
नेशनल रेजिस्टेंस फ्रंट समेत कई संगठनों ने इस कानून की कड़ी आलोचना करते हुए कहा है कि इससे न्याय प्रणाली सामाजिक हैसियत पर आधारित हो जाएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कानून समानता, स्वतंत्रता और बुनियादी मानवाधिकारों के मूल सिद्धांतों को कमजोर करता है और इससे अफगानिस्तान में आम नागरिकों, खासकर निचले वर्ग और महिलाओं की स्थिति और अधिक दयनीय हो सकती है।