Summer express/धर्मशाला, राहुल-: हिमाचल प्रदेश के जंगलों में हर वर्ष चील (पाइन) की सूखी पत्तियों के कारण लगने वाली आग एक गंभीर पर्यावरणीय चुनौती बनी रहती है। अब कांगड़ा जिले के पालमपुर से शुरू हुई एक अभिनव पहल इस समस्या का समाधान तलाशने के साथ-साथ ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी तैयार कर रही है। स्थानीय युवा राजन मिन्हास ने चील की सूखी पत्तियों से बायोडिग्रेडेबल प्लांटर्स विकसित किए हैं, जिन्हें जिला प्रशासन का भी समर्थन मिल गया है। इस पहल का उद्देश्य जंगलों में आग की घटनाओं को कम करना, प्लास्टिक के उपयोग को घटाना और स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाना है।
पालमपुर निवासी राजन मिन्हास ने बताया कि उनकी संस्था ‘काँक्षी’ ने लगभग एक वर्ष के शोध और प्रयोग के बाद चील की सूखी पत्तियों से पर्यावरण अनुकूल प्लांटर्स तैयार किए हैं। उन्होंने कहा कि बचपन से जंगलों में लगने वाली आग को देखते हुए उनके मन में इस समस्या के समाधान का विचार आया। लंबे प्रयासों के बाद ऐसा उत्पाद तैयार किया गया, जो पूरी तरह बायोडिग्रेडेबल है और उपयोग के बाद प्राकृतिक रूप से मिट्टी में मिल जाता है। इसकी एक विशेषता यह भी है कि इसमें सामान्य प्लांटर्स की तुलना में फंगस लगने की संभावना काफी कम रहती है।राजन मिन्हास के अनुसार, जंगलों में बिखरी रहने वाली पाइन नीडल्स आग फैलने का प्रमुख कारण बनती हैं। यदि इन्हें उपयोगी उत्पादों में बदला जाए तो जंगलों में ज्वलनशील सामग्री कम होगी और आग की घटनाओं में भी कमी लाई जा सकेगी। उन्होंने बताया कि इस उत्पाद का परीक्षण सीएसआईआर-आईएचबीटी सहित अन्य संस्थानों द्वारा किया जा रहा है, ताकि भविष्य में इसे बड़े स्तर पर किसानों, बागवानी क्षेत्र और नर्सरियों में उपयोग के लिए उपलब्ध कराया जा सके।
इस अभियान में शैलजा स्वयं सहायता समूह की महिलाओं की अहम भूमिका है। समूह की प्रधान कल्पना ने बताया कि महिलाएं स्वयं जंगलों से पाइन नीडल्स एकत्रित करती हैं। इसके बाद मशीनों की सहायता से उन्हें प्रोसेस कर बायोडिग्रेडेबल प्लांटर्स तैयार किए जाते हैं। उन्होंने कहा कि इस कार्य से एक ओर जंगलों की सफाई हो रही है तो दूसरी ओर महिलाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार और आय का स्थायी माध्यम भी मिल रहा है। भविष्य में इन प्लांटर्स पर विशेष वैक्स कोटिंग करने की भी योजना है, जिससे उनकी मजबूती और उपयोगिता बढ़ाई जा सके।राजन मिन्हास ने बताया कि उनका स्वयं सहायता समूह पहले से अगरबत्ती, धूप और अन्य पर्यावरण अनुकूल उत्पाद भी तैयार कर रहा है, जिनकी बिक्री ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और विभिन्न प्रदर्शनियों के माध्यम से की जाती है। अब उनका प्रयास अधिक से अधिक स्वयं सहायता समूहों को इस पहल से जोड़ने का है, ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ाए जा सकें और पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी व्यापक स्तर तक पहुंचे।
उपायुक्त कांगड़ा हेमराज बैरवा ने इस नवाचार की सराहना करते हुए कहा कि चील की सूखी पत्तियां जंगलों में आग लगने का बड़ा कारण हैं। ऐसे में इन्हें उपयोगी उत्पादों में बदलने की यह पहल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में प्रभावी कदम है।उन्होंने बताया कि जिला प्रशासन राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एसआरएलएम) के माध्यम से स्वयं सहायता समूहों को मशीनें उपलब्ध कराने, प्रशिक्षण देने और इस परियोजना का विस्तार करने की योजना पर कार्य कर रहा है। साथ ही विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों और मंचों के माध्यम से इन पर्यावरण अनुकूल प्लांटर्स को बढ़ावा दिया जाएगा, जिससे महिलाओं की आय में वृद्धि होगी और जंगलों में आग की घटनाओं को कम करने में भी सहायता मिलेगी।