Summer express, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की तीन-भाषा व्यवस्था को लेकर सुनवाई के दौरान अहम टिप्पणियां सामने आईं। न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने कक्षा 9 से तीसरी भाषा को अनिवार्य किए जाने पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों पर इससे अतिरिक्त शैक्षणिक दबाव पड़ सकता है।
यह टिप्पणी तमिलनाडु सरकार की उस अपील की सुनवाई के दौरान की गई, जिसमें मद्रास हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसमें राज्य सरकार को प्रत्येक जिले में जवाहर नवोदय विद्यालय (JNV) स्थापित करने के लिए आवश्यक अनुमति देने का निर्देश दिया गया था। तमिलनाडु सरकार लंबे समय से नवोदय विद्यालयों का विरोध करती रही है और इसकी प्रमुख वजह वहां लागू तीन-भाषा नीति को बताया जाता है।
हालांकि, इस मामले में सीबीएसई की भाषा नीति की वैधता सीधे तौर पर विवाद का विषय नहीं थी, लेकिन सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति नागरत्ना ने तीसरी भाषा को कक्षा 9 से लागू करने के समय को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की।
उल्लेखनीय है कि सीबीएसई की तीन-भाषा नीति को लेकर दायर विभिन्न जनहित याचिकाओं पर भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ अलग से सुनवाई कर रही है। शीर्ष अदालत की उस पीठ ने फिलहाल नीति के क्रियान्वयन पर रोक लगाने से इनकार किया है और मामले की अगली सुनवाई अगले सप्ताह निर्धारित की है।
सुनवाई के दौरान तमिलनाडु सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता ने कहा कि राज्य की आपत्ति मुख्य रूप से तीन-भाषा नीति को लेकर है। इस पर न्यायमूर्ति नागरत्ना ने स्पष्ट किया कि नीति में कहीं भी तीसरी भाषा के रूप में हिंदी को अनिवार्य नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि व्यवस्था के तहत राज्य की भाषा, अंग्रेजी और एक तीसरी भाषा पढ़ाई जानी है, लेकिन उसमें हिंदी को अनिवार्य नहीं बताया गया है।
वहीं, हाई कोर्ट में याचिका दायर करने वाले एनजीओ की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जी. प्रियदर्शिनी ने अदालत को बताया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि किसी भी राज्य पर कोई भाषा नहीं थोपी जाएगी।
इस दौरान न्यायमूर्ति नागरत्ना ने तमिलनाडु सरकार से सवाल किया कि यदि तीसरी भाषा हिंदी के बजाय संस्कृत हो, तब भी क्या राज्य को आपत्ति होगी। इस पर राज्य की ओर से जवाब दिया गया कि तीसरी भाषा को कक्षा 9 से अनिवार्य किए जाने पर ही उनकी मुख्य आपत्ति है। सुनवाई के दौरान इस मुद्दे पर दोनों पक्षों ने अपने-अपने तर्क अदालत के समक्ष रखे।