नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय रेलवे को अपने आधिकारिक दस्तावेजों और नियमावली में प्रयुक्त ‘सेकेंड क्लास पैसेंजर’ शब्द पर पुनर्विचार करने की सलाह देते हुए कहा है कि ‘सेकेंड क्लास’ शब्द का संबंध केवल रेलवे कोच से होना चाहिए, यात्रियों से नहीं।
अदालत ने कहा कि किसी यात्री को इस तरह संबोधित करना संविधान की समानता और गरिमा की भावना के अनुरूप नहीं है। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने वर्ष 2015 के एक रेल हादसे से जुड़े मुआवजा मामले की सुनवाई के दौरान की।
मामले में एक व्यक्ति चलती ट्रेन से गिरकर घायल हो गया था और बाद में उसकी मृत्यु हो गई। रेलवे ने यह कहते हुए मुआवजा देने से इनकार किया था कि मृतक का टिकट बरामद नहीं हुआ था। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया और कहा कि केवल टिकट का न मिलना किसी व्यक्ति को वैध यात्री मानने से इनकार करने का आधार नहीं हो सकता। अदालत ने मृतक की पत्नी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए रेलवे को चार सप्ताह के भीतर आठ लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया। तय समय में भुगतान नहीं होने पर आठ प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।
सम्मानजनक भाषा पर जोर
अदालत ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक संस्थानों की भाषा भी संविधान के मूल्यों के अनुरूप होनी चाहिए। न्यायालय का मानना है कि यात्रियों को ‘सेकेंड क्लास’ कहना उचित नहीं है, क्योंकि श्रेणी का संबंध केवल डिब्बे से है, व्यक्ति से नहीं। सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी को रेलवे की आधिकारिक शब्दावली और यात्री सम्मान से जुड़े महत्वपूर्ण निर्देश के रूप में देखा जा रहा है।
रेलवे को दिए अहम सुझाव
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रेनों में अत्यधिक भीड़ के कारण यात्रियों के गिरने और दुर्घटनाओं की घटनाएं लगातार सामने आती हैं। अदालत ने रेलवे से भीड़ नियंत्रण के लिए प्रभावी व्यवस्था विकसित करने, सुरक्षा उपाय मजबूत करने तथा पर्याप्त मानव संसाधन उपलब्ध कराने पर भी जोर दिया। न्यायालय ने कहा कि आधुनिक तकनीक के साथ बेहतर प्रबंधन और पर्याप्त कर्मचारियों की नियुक्ति से यात्रियों की सुरक्षा में सुधार किया जा सकता है।