अंबाला में पराली जलाने पर जीरो टॉलरेंस, जुर्माने के साथ FIR का प्रावधान
रेड एंट्री होने पर दो सीजन तक MSP पर फसल बेचने में रोक, किसानों ने मांगा पराली न जलाने का मुआवजा
Summer express/अंबाला-:हरियाणा में धान की कटाई के साथ ही पराली प्रबंधन को लेकर प्रशासन ने सख्ती बढ़ा दी है। कृषि विभाग ने पराली सीजन 2025-26 के लिए जीरो टॉलरेंस नीति लागू की है। पराली जलाने वाले किसानों पर जमीन के रकबे के हिसाब से पांच हजार से लेकर 30 हजार रुपये तक जुर्माने का प्रावधान किया गया है। इसके साथ ही संबंधित धाराओं के तहत FIR दर्ज करने और मेरी फसल मेरा ब्यौरा पोर्टल पर रेड एंट्री करने की कार्रवाई भी की जाएगी। रेड एंट्री होने के बाद किसान दो सीजन तक अपनी फसल MSP पर सरकारी मंडी में नहीं बेच पाएंगे और सरकारी सब्सिडी व योजनाओं के लाभ से भी वंचित रह सकते हैं। हालांकि, दूसरी तरफ किसान सरकार से पराली नहीं जलाने पर प्रति क्विंटल 100 रुपये मुआवजा देने की मांग कर रहे हैं।
धान की फसल की सरकारी खरीद शुरू हो चुकी है, लेकिन खेतों में अभी बड़ी मात्रा में धान खड़ा है। कृषि विभाग के मुताबिक करीब 60 फीसदी धान की कटाई अभी बाकी है। जैसे-जैसे धान की कटाई आगे बढ़ेगी, वैसे-वैसे पराली प्रबंधन की चुनौती भी बढ़ने वाली है।पराली जलाने से निकलने वाला धुआं वातावरण को प्रभावित करता है। धुएं और स्मॉग के कारण सांस से जुड़ी परेशानियों के साथ-साथ आंखों में जलन जैसी समस्याएं भी सामने आती हैं। इसी को देखते हुए हरियाणा कृषि विभाग ने इस सीजन में पराली जलाने के मामलों पर सख्ती बरतने का फैसला किया है।अंबाला के उप कृषि निदेशक वजीर सिंह के मुताबिक, दो एकड़ से कम जमीन पर पराली जलाने पर पांच हजार रुपये, दो से पांच एकड़ तक दस हजार रुपये और पांच एकड़ से ज्यादा जमीन पर पराली जलाने पर 30 हजार रुपये तक जुर्माना लगाया जाएगा।इसके अलावा पराली जलाने वाले किसान के खिलाफ वायु प्रदूषण अधिनियम 1981 की धारा 39 और BNS की धारा 223(A) के तहत FIR दर्ज करने का प्रावधान भी बताया गया है।
कृषि विभाग की कार्रवाई सिर्फ जुर्माने तक सीमित नहीं रहेगी। पराली जलाने वाले किसान की मेरी फसल मेरा ब्यौरा पोर्टल पर रेड एंट्री की जाएगी। विभाग के अनुसार रेड एंट्री वाले किसान दो सीजन तक सरकारी मंडी में MSP पर फसल बेचने से वंचित रहेंगे। इसके साथ ही सरकारी सब्सिडी और विभिन्न योजनाओं का लाभ भी प्रभावित होगा।हालांकि, विभाग की ओर से किसानों को पराली प्रबंधन के लिए प्रोत्साहन राशि भी दी जा रही है। उप कृषि निदेशक के मुताबिक जो किसान पराली नहीं जलाएंगे और उसका वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन करेंगे, उन्हें 1200 रुपये प्रति एकड़ की प्रोत्साहन राशि दी जा रही है। इससे पहले यह राशि 1000 रुपये प्रति एकड़ थी।
कृषि विभाग किसानों को पराली जलाने के बजाय मशीनों के जरिए उसका प्रबंधन करने की सलाह दे रहा है। हैप्पी सीडर, सुपर सीडर, चॉपर, मल्चर, रोटावेटर और स्ट्रॉ बेलर जैसी मशीनों की मदद से पराली को खेत में ही मिलाया जा सकता है या फिर उसकी गांठें बनाकर उपयोग किया जा सकता है।विभाग का कहना है कि खेत में पराली मिलाने से जैविक पदार्थ बढ़ता है और पराली की गांठें बनाकर बेचने से किसानों को अतिरिक्त आमदनी भी हो सकती है। किसानों को कस्टम हायरिंग सेंटर यानी CHC से मशीनें किराये पर लेने की सलाह दी जा रही है। छोटे और सीमांत किसानों के लिए कई स्थानों पर मशीनें किराया-मुक्त उपलब्ध कराने की बात भी विभाग की ओर से कही गई है।पराली जलाने की घटनाओं पर नजर रखने के लिए सैटेलाइट के जरिए निगरानी की जा रही है। गांव स्तर पर नोडल अधिकारियों की तैनाती की गई है और 50 से ज्यादा किसानों पर एक नोडल अधिकारी की जिम्मेदारी बताई गई है। इसके अलावा जिला, ब्लॉक और क्लस्टर स्तर पर पराली प्रोटेक्शन फोर्स भी बनाई गई है, जिसमें कृषि, राजस्व, पंचायत और पुलिस विभाग के अधिकारी-कर्मचारी शामिल हैं।
उधर, हमारी टीम ने अंबाला के गांव शाहपुर में खेतों का जायजा लिया। ज्यादातर खेतों में धान की फसल पककर तैयार नजर आई, जबकि कुछ जगहों पर कटाई का काम भी चल रहा था। कई खेतों में धान की कटाई के बाद पराली की गांठें भी तैयार करके रखी गई थीं।किसानों ने बताया कि वे पिछले कुछ वर्षों से पराली जलाने के बजाय उसका प्रबंधन कर रहे हैं। कुछ किसानों के मुताबिक धान की कटाई के बाद पराली की गांठें बनाकर रख दी जाती हैं और बाद में इन्हें बेचने से उन्हें आमदनी होती है।हालांकि, कुछ किसानों का कहना है कि अगली फसल की बुवाई का समय कम होने के कारण उनके सामने पराली प्रबंधन की चुनौती रहती है। खासकर जिन किसानों को धान के बाद आलू या सूरजमुखी की फसल लगानी होती है, उनके लिए खेत खाली करने का समय बेहद सीमित होता है। किसानों का आरोप है कि कई बार पराली प्रबंधन की व्यवस्था समय पर उपलब्ध नहीं हो पाती और उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।किसानों का कहना है कि अगर सरकार पराली न जलाने वाले किसानों को अतिरिक्त आर्थिक सहायता दे और समय पर मशीनरी उपलब्ध कराए, तो पराली जलाने की घटनाओं को और कम किया जा सकता है।