समर न्यूज | नई दिल्ली
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की कक्षा 9 की नई सामाजिक विज्ञान पुस्तक में मध्यकालीन भारतीय इतिहास को ‘प्रतिरोध और दृढ़ता’ के व्यापक संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है।
‘अंडरस्टैंडिंग सोसाइटी : इंडिया एंड बियॉन्ड-पार्ट 2’ नाम की यह पुस्तक 29 सितंबर को जारी की गई। इतिहास के ‘रेजिस्टेंस एंड रेजिलिएंस’ अध्याय में 1000 से 1700 ईस्वी के बीच भारत में हुए आक्रमणों, क्षेत्रीय शक्तियों के संघर्ष और सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण पर चर्चा की गई है। पुस्तक में सिख गुरुओं और मुगल सत्ता के संबंधों को विशेष स्थान दिया गया है। इसमें कहा गया है कि 17वीं शताब्दी की शुरुआत से सिख गुरुओं के बढ़ते सामाजिक, सांस्कृतिक प्रभाव के कारण मुगल सत्ता का उनके मामलों में हस्तक्षेप बढ़ा। जहांगीर ने गुरु अर्जन देव के खिलाफ उनके विद्रोही पुत्र खुसरो मिर्जा का कथित समर्थन करने के आरोप के आधार पर कार्रवाई की।
गुरु अर्जन देव की शहादत को सिख इतिहास में महत्वपूर्ण मोड़ बताया गया है। गुरु हरगोबिंद को ग्वालियर किले में नजरबंद किए जाने और बाद में अकाल तख्त की स्थापना का भी उल्लेख है। पुस्तक में गुरु तेग बहादुर की 1675 में औरंगजेब के आदेश पर हुई शहादत का भी उल्लेख है।
जाटों और अन्य शक्तियों का प्रतिरोध
अध्याय में मुगल सत्ता के खिलाफ जाटों के संघर्ष को भी विस्तार से जगह दी गई है। पुस्तक के अनुसार, गंगा-यमुना दोआब के जाट किसानों पर भारी कर और शोषण के साथ औरंगजेब की धार्मिक नीतियों ने असंतोष बढ़ाया। 1669 में गोकुल जाट के नेतृत्व में विद्रोह और बाद में 1686 में जाटों के दूसरे विद्रोह का उल्लेख किया गया है। इसके अलावा 1671 के सरायघाट युद्ध में अहोम सेनापति लाचित बोरफुकन की मुगल बेड़े पर जीत तथा मेवाड़ में 1582 के देवर युद्ध का भी वर्णन है। मराठों के स्वराज्य और राजपूत प्रतिरोध को भी अध्याय में शामिल किया गया है।
मध्यकालीन इतिहास का नया ढांचा
नई पुस्तक मध्यकालीन इतिहास को केवल राजवंशों और युद्धों के क्रम में रखने के बजाय आक्रमण, प्रतिरोध, राजनीतिक संगठन और सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण से जोड़ती है। इसमें विजयनगर, अहोम, मराठा, सिख और जाट शक्तियों के संघर्षों के साथ भक्ति परंपरा और धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतिक्रियाओं का भी उल्लेख है। पुस्तक में मंदिरों के निर्माण और पुनर्निर्माण तथा कुछ मंदिरों के विध्वंस से जुड़े प्रसंग भी शामिल किए गए हैं।
पाठ्यपुस्तक पर चर्चा
नई पुस्तक के इतिहास संबंधी दृष्टिकोण पर विशेषज्ञों के बीच अलग-अलग मत सामने आए हैं। कुछ विश्लेषणों में कहा गया है कि इसमें प्रतिरोध के प्रसंगों को पहले की तुलना में अधिक स्थान मिला है, जबकि अन्य इतिहासकारों ने सिख-मुगल संबंधों की धार्मिक व्याख्या को लेकर सवाल उठाए हैं और इसे राजनीतिक परिस्थितियों के संदर्भ में भी देखने की आवश्यकता बताई है। पुस्तक में प्रस्तुत विवरण को इसी पाठ्यक्रम के ऐतिहासिक दृष्टिकोण के रूप में देखा जाना चाहिए।