Summer Express, करनाल (राकेश कुमार शर्मा)। दिवाली के अवसर पर बाजार में जहां मिठाइयों और पारंपरिक उपहारों की मांग बढ़ रही है, वहीं महाराणा प्रताप हॉर्टिकल्चर विश्वविद्यालय (MHU), करनाल के विद्यार्थियों ने इस बार त्योहार के लिए कुछ अनूठे और पर्यावरण के अनुकूल उपहार तैयार किए हैं। विद्यार्थियों ने शहद और मधुमक्खियों से मिलने वाले प्राकृतिक मोम (बीवैक्स) का इस्तेमाल कर कई तरह के आकर्षक उत्पाद विकसित किए हैं। इन उत्पादों के जरिए न केवल दिवाली के उपहारों को नया विकल्प मिलेगा, बल्कि मधुमक्खी पालकों और किसानों के लिए अतिरिक्त आय के अवसर भी पैदा हो सकते हैं।
विद्यार्थियों ने शहद और बीवैक्स से हनी पीनट बटर, ड्राई फ्रूट हनी मिक्स, बी-पोलन युक्त शहद, चॉकलेट-बनाना हनी, हर्बल कैंडल, लिप बाम, साबुन, रूम फ्रेशनर और सजावटी वस्तुएं तैयार की हैं। इन उत्पादों को प्राकृतिक सामग्री, आकर्षक पैकेजिंग और किफायती कीमत को ध्यान में रखकर बनाया गया है। विद्यार्थियों का उद्देश्य मधुमक्खी पालन से मिलने वाले संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल कर उन्हें नए उत्पादों और बाजारों से जोड़ना है।
विद्यार्थियों ने शहद को केवल बोतलों में पैक करके बेचने के बजाय उससे कई तरह के वैल्यू एडेड उत्पाद तैयार किए हैं। ड्राई फ्रूट्स और बी-पोलन के साथ शहद के मिश्रण के अलावा चॉकलेट-बनाना हनी जैसे विकल्प भी विकसित किए गए हैं। इन उत्पादों के जरिए शहद को रोजमर्रा के खानपान में नए रूप में शामिल करने का प्रयास किया गया है। इसके अलावा शहद से मीठा किया हुआ पीनट बटर भी तैयार किया गया है, जिसमें नारियल तेल का इस्तेमाल किया गया है।
खानपान से जुड़े उत्पादों के साथ विद्यार्थियों ने व्यक्तिगत देखभाल के लिए भी कई प्रयोग किए हैं। इनमें शहद आधारित स्वीटनिंग एजेंट से तैयार कॉफी, हेयर मिस्ट और त्वचा की देखभाल से जुड़े उत्पाद शामिल हैं। इस पहल के माध्यम से विद्यार्थियों ने मधुमक्खी पालन से प्राप्त प्राकृतिक संसाधनों के विविध उपयोग की संभावनाएं सामने रखी हैं।
बीवैक्स से तैयार रंग-बिरंगी और खुशबूदार मोमबत्तियां भी आकर्षण का केंद्र हैं। विद्यार्थियों ने मधुमक्खी के मोम को साफ कर अलग-अलग सांचों में ढालकर कई डिजाइन की कैंडल बनाई हैं। इनमें हिबिस्कस के फूल जैसी आकृतियों के साथ सजावटी डिजाइन भी शामिल हैं। कुछ मोमबत्तियों में लेमनग्रास और जैस्मिन जैसे एसेंशियल ऑयल का इस्तेमाल किया गया है, जिससे इनमें खुशबू भी आती है। विद्यार्थियों के अनुसार, इन कैंडल की कीमत लगभग 30 से 40 रुपये रखी गई है।
दिवाली के पारंपरिक महत्व को ध्यान में रखते हुए स्वस्तिक, कलश और माता के चरणों जैसे शुभ प्रतीकों वाली आकृतियां भी तैयार की गई हैं। इन्हें आकर्षक गिफ्ट बॉक्स में सजाया गया है। विद्यार्थियों का मानना है कि त्योहारों पर लोग अब मिठाइयों के अलावा उपयोगी, अलग और पर्यावरण के अनुकूल उपहारों में भी रुचि दिखा रहे हैं। ऐसे में प्राकृतिक मोम से बने ये उत्पाद एक नया विकल्प बन सकते हैं।
इस पहल का एक अहम पहलू किसानों की आमदनी बढ़ाने की संभावना है। सामान्य तौर पर किसान शहद को 300 से 400 रुपये प्रति किलो के भाव से बेचते हैं, जबकि उसी शहद से वैल्यू एडेड उत्पाद तैयार करने पर उसका बाजार मूल्य करीब 800 रुपये तक पहुंच सकता है। हालांकि, वास्तविक कमाई उत्पादन लागत, गुणवत्ता, पैकेजिंग और बाजार में मांग पर निर्भर करेगी। इसी तरह शहद निकालने के बाद बचने वाले मोम से कैंडल, लिप बाम, साबुन और सजावटी सामान बनाकर अतिरिक्त आमदनी हासिल की जा सकती है।
विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों की यह पहल कृषि आधारित उद्यमिता और मूल्य संवर्धन की दिशा में एक उदाहरण पेश करती है। विद्यार्थियों के अनुसार, उनके तैयार उत्पादों के लिए थोक ऑर्डर भी मिले हैं। इससे उन्हें उम्मीद है कि आने वाले समय में किसान, युवा और स्वयं सहायता समूह भी मधुमक्खी पालन से जुड़े उत्पाद तैयार कर अपना व्यवसाय शुरू कर सकते हैं।
महाराणा प्रताप हॉर्टिकल्चर विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. सुरेश मल्होत्रा ने कहा कि विश्वविद्यालय के विद्यार्थी अनुसंधान और नवाचार के माध्यम से ऐसे प्राकृतिक और पर्यावरण के अनुकूल उत्पाद तैयार कर रहे हैं, जो किसानों और उनके परिवारों की आय बढ़ाने में सहायक हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि किसानों की उपज को केवल बेचने तक सीमित रखने के बजाय उसका मूल्य संवर्धन कर नए उत्पादों के रूप में बाजार तक पहुंचाना जरूरी है। इससे किसानों को बेहतर दाम मिल सकते हैं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।
डॉ. मल्होत्रा ने कहा कि दिवाली जैसे त्योहारों पर शुद्ध शहद को आकर्षक गिफ्ट पैक के रूप में पेश किया जा सकता है। वहीं मधुमक्खी के मोम से मोमबत्तियां, दीये, साबुन और शोपीस तैयार किए जा सकते हैं। उन्होंने फूलों से प्राकृतिक रंग निकालकर पर्यावरण के अनुकूल रंगोली बनाने तथा फल, सब्जियां, मसाले और मशरूम को आकर्षक पैकेजिंग में बाजार तक पहुंचाने की संभावनाओं पर भी जोर दिया।
कुलपति ने बताया कि विश्वविद्यालय के विद्यार्थी ही नहीं, बल्कि स्वयं सहायता समूह भी इस दिशा में नए प्रयोग कर रहे हैं। मूल्य संवर्धन और नए बाजार विकसित करने से किसानों को बेहतर कीमत मिलने के साथ ग्रामीण महिलाओं और स्वयं सहायता समूहों के लिए रोजगार के अवसर भी बढ़ सकते हैं। इससे बागवानी, मधुमक्खी पालन और मशरूम उत्पादन को प्रोत्साहन मिलेगा तथा उपभोक्ताओं को प्राकृतिक और गुणवत्तापूर्ण उत्पाद उपलब्ध हो सकेंगे।
इस पहल में विश्वविद्यालय के फाइनल ईयर के विद्यार्थी पुनीत कुमार और चतुर्थ वर्ष की छात्रा कांता सहित अन्य विद्यार्थियों ने योगदान दिया है।