नई दिल्ली। जब बात ब्लड ग्रुप्स की होती है तो ज्यादातर लोग A, B, AB और O तक ही सीमित जानकारी रखते हैं। लेकिन हाल ही में विज्ञान की दुनिया में एक ऐसा खून का ग्रुप सामने आया है, जिसे अब तक सिर्फ एक इंसान में पाया गया है। इस बेहद दुर्लभ ब्लड ग्रुप का नाम है ‘Gwada Negative’, जिसे जून 2025 में दुनिया के 48वें आधिकारिक ब्लड ग्रुप सिस्टम के रूप में मान्यता दी गई है।
क्या है ‘Gwada Negative’ ब्लड ग्रुप?
‘Gwada Negative’ कोई साधारण ब्लड ग्रुप नहीं, बल्कि यह EMM-Negative System का हिस्सा है, जिसमें एक खास एंटीजन EMM पूरी तरह से अनुपस्थित होता है। इस एंटीजन की मौजूदगी 99.9999% लोगों के रक्त में सामान्य तौर पर पाई जाती है।
इस ब्लड ग्रुप की खोज फ्रांस के राष्ट्रीय ब्लड सेंटर EFS (Établissement Français du Sang) ने की, जिसे ISBT (International Society of Blood Transfusion) ने अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में आधिकारिक मान्यता दी।
केवल एक व्यक्ति में मिला — 68 वर्षीय महिला से जुड़ा है मामला
यह ब्लड ग्रुप फ्रांस के ग्वाडेलूप द्वीप समूह की 68 वर्षीय महिला में पाया गया, जिनके खून की जांच के दौरान डॉक्टरों ने पाया कि उनके शरीर में EMM एंटीजन पूरी तरह गायब है।
15 साल पुरानी गुत्थी, जो अब सुलझी
2009 में महिला की एक सामान्य सर्जरी से पहले की गई जांच में अज्ञात एंटीबॉडी पाई गई थी। तकनीक की सीमाओं के कारण उस समय इसका विश्लेषण नहीं हो सका। 2019 में जब नेक्स्ट जेनरेशन सीक्वेंसिंग (NGS) तकनीक से दोबारा जांच हुई, तब वैज्ञानिक इस ब्लड ग्रुप की गुत्थी सुलझाने में सफल हुए।
क्यों है यह ब्लड ग्रुप इतना अनोखा और संवेदनशील?
EMM की अनुपस्थिति का मतलब है कि महिला का इम्यून सिस्टम लगभग हर दूसरे व्यक्ति के खून को विदेशी मान सकता है। यानी वह किसी और से खून नहीं ले सकती — केवल खुद के खून से ही उसका ट्रांसफ्यूजन संभव है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह महिला दुनिया की इकलौती इंसान है जिसके खून से उसका ही मिलान होता है।
दुर्लभ जेनेटिक कारण
विशेषज्ञों के मुताबिक, यह ब्लड ग्रुप महिला को तब मिला जब दोनों माता-पिता से म्यूटेटेड जीन की प्रतियां मिलीं — एक ऐसी जेनेटिक स्थिति जिसे हॉमो-रेसिसिव म्यूटेशन कहा जाता है।
‘Gwada Negative’ नाम क्यों पड़ा?
‘Gwada’ शब्द ग्वाडेलूप द्वीप का स्थानीय नाम है। वैज्ञानिकों ने इस दुर्लभ खोज को सम्मान देने के लिए इसे ‘Gwada Negative’ नाम दिया है।
चिकित्सा क्षेत्र के लिए क्या है इसका महत्व?
EFS के प्रमुख बायोलॉजिस्ट थियरी पेयरार्ड के अनुसार, “हर नया ब्लड ग्रुप सिस्टम, ट्रांसफ्यूजन साइंस और ब्लड से जुड़ी बीमारियों के इलाज में नई संभावनाएं पैदा करता है।” यह खोज थैलेसीमिया, ब्लड कैंसर और ऑटोइम्यून बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए एक नई उम्मीद बन सकती है।
भविष्य की दिशा: क्या किया जा रहा है?
इस महिला का ब्लड बायोबैंक में संरक्षित किया गया है। वैज्ञानिक भविष्य में जेनेटिक थेरपी या कृत्रिम रक्त कोशिकाओं के ज़रिए ऐसे दुर्लभ मामलों के इलाज की दिशा में काम कर रहे हैं।