नई दिल्ली | भारत की अर्थव्यवस्था को प्रवासी भारतीयों से मिलने वाला सहयोग लगातार नया मुकाम हासिल कर रहा है। वित्त वर्ष 2024-25 में 135.46 अरब डॉलर (करीब ₹11.63 लाख करोड़) का रेमिटेंस देश में आया, जो अब तक का सबसे ऊंचा सालाना स्तर है। इसने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के आंकड़े को भी पीछे छोड़ दिया है, जो भारत की वैश्विक आर्थिक रिश्तों में बढ़ती अहमियत को दर्शाता है।
8 साल में दोगुना हुआ रेमिटेंस, औसतन 16% की वार्षिक वृद्धि
वित्त वर्ष 2014-15 में जहां कुल रेमिटेंस ₹6 लाख करोड़ था, वहीं 2024-25 में यह दोगुने से भी ज्यादा बढ़कर ₹11.63 लाख करोड़ तक पहुंच गया है। पिछले 10 वर्षों में रेमिटेंस में औसतन 16% की सालाना वृद्धि दर्ज की गई है। यह न सिर्फ प्रवासी भारतीयों की आय में इजाफा दिखाता है, बल्कि भारत से उनके भावनात्मक जुड़ाव की भी पुष्टि करता है।
भारत लगातार बना हुआ है रेमिटेंस का वैश्विक लीडर
वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, भारत लगातार पिछले 10 वर्षों से दुनिया का सबसे बड़ा रेमिटेंस प्राप्त करने वाला देश बना हुआ है:
- मैक्सिको ₹5.8 लाख करोड़ के साथ दूसरे स्थान पर
- चीन ₹4.1 लाख करोड़ के साथ तीसरे स्थान पर
व्यापार घाटे को कम करने में बड़ी भूमिका
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के अनुसार, भारत को मिलने वाले कुल रेमिटेंस का करीब 45% हिस्सा अमेरिका, ब्रिटेन और सिंगापुर से आता है। यह आर्थिक मदद भारत के व्यापार घाटे का लगभग 47% हिस्सा कवर करती है, जिससे चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) स्थिर रहता है।
बीते वर्षों में रेमिटेंस का ट्रेंड (₹ लाख करोड़ में):
| वित्त वर्ष | रेमिटेंस |
| 2014-15 | 6.00 |
| 2015-16 | 5.62 |
| 2016-17 | 5.26 |
| 2017-18 | 5.93 |
| 2018-19 | 6.55 |
| 2019-20 | 7.13 |
| 2020-21 | 6.87 |
| 2021-22 | 7.64 |
| 2022-23 | 9.64 |
| 2023-24 | 10.18 |
| 2024-25 | 11.63 |