नई दिल्ली | भारतीय जनता पार्टी ने आधे से ज्यादा राज्यों में नए प्रदेश अध्यक्षों की नियुक्ति कर दी है, लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष के नाम को लेकर पार्टी अब तक स्पष्ट नहीं हो सकी है। यह भले ही संगठनात्मक रूप से कोई संकट न हो, लेकिन राजनीतिक हलकों में यह चर्चा का बड़ा विषय बन चुका है—खासकर तब, जब विपक्ष बीजेपी पर आंतरिक लोकतंत्र की कमी का आरोप लगातार लगाता रहा है।
तो फिर देरी की वजह क्या है?
पार्टी सूत्रों और विश्लेषकों की मानें तो राष्ट्रीय अध्यक्ष के चयन में देरी की तीन बड़ी वजहें हैं:
1. सिर्फ संघ का फैसला नहीं चलता
बीजेपी अब पहले जैसी नहीं रही। अब वो एक आत्मनिर्भर, केंद्र में लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने वाली पार्टी है। ऐसे में राष्ट्रीय अध्यक्ष का चयन संघ के निर्देश मात्र से नहीं हो सकता।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की राजनीतिक रणनीति और पसंद भी उतनी ही अहम है। इन तीनों धड़ों (मोदी, शाह और संघ) के बीच संतुलन बनाने की प्रक्रिया में समय लग रहा है।
2. लेकिन संघ को नज़रअंदाज़ भी नहीं कर सकते
हालांकि बीजेपी की आत्मनिर्भरता बढ़ी है, लेकिन संघ का प्रभाव खत्म नहीं हुआ है। खासकर 2024 लोकसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत न मिलने के बाद पार्टी को संघ के कैडर और विचारधारा की ज़रूरत और भी ज़्यादा महसूस हो रही है। अध्यक्ष पद पर वही व्यक्ति बैठ सकता है, जिसे संघ की भी हरी झंडी हो।
3. प्राथमिकताओं का टकराव
बीजेपी एक ऐसा अध्यक्ष चाहती है जो मोदी और शाह की राजनीतिक दिशा के साथ आसानी से तालमेल बिठा सके और आगामी राज्य चुनावों (जैसे बिहार, बंगाल) में निर्णायक भूमिका निभा सके।
वहीं, संघ एक ऐसा चेहरा चाहता है जो वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध, साफ-सुथरी छवि वाला और अपेक्षाकृत युवा हो—even if वो सरकार के एजेंडे को थोड़ा पीछे रखे।
यही वैचारिक और कार्यशैली का टकराव राष्ट्रीय अध्यक्ष के चयन में देरी की अहम वजह बन गया है।
कब तक होगा ऐलान?
संभावना है कि बीजेपी मानसून सत्र के बाद या बिहार चुनाव की तैयारियों से पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष की घोषणा करेगी। यदि चुनावी समीकरणों में ज़रूरी समझा गया, तो यह ऐलान बिहार चुनाव तक टाला भी जा सकता है, ताकि नया चेहरा समय से पहले चुनावी रणनीति में फिट बैठ सके।