नई दिल्ली | मुंबई की लोकल ट्रेनों में 11 जुलाई 2006 को हुए सीरियल बम धमाकों ने पूरे देश को दहला दिया था। इस दर्दनाक हादसे को लगभग दो दशक बीत चुके हैं और अब बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस केस में एक चौंकाने वाला फैसला सुनाया है। कोर्ट ने 12 दोषियों को बरी कर दिया है, जिनमें से 5 को पहले फांसी और 7 को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।
सबूत नहीं, सिर्फ सवाल
जस्टिस अनिल किलोर और जस्टिस श्याम चांदक की विशेष बेंच ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में पूरी तरह विफल रहा। कोर्ट ने गवाहों की गवाही और सबूतों को अविश्वसनीय करार देते हुए साफ कहा कि इस केस में जांच और प्रस्तुतियां गंभीर रूप से कमजोर थीं।
गवाहों की गवाही पर उठे सवाल
कोर्ट का कहना था कि धमाकों के करीब 100 दिन बाद गवाहों द्वारा दिए गए बयान भरोसेमंद नहीं माने जा सकते। टैक्सी ड्राइवरों और ट्रेन में मौजूद यात्रियों के बयानों में विरोधाभास थे।
बम, नक्शे, हथियार… सबूत भी खारिज
कोर्ट ने बम, नक्शे और हथियारों जैसी कथित बरामदगी को भी खारिज कर दिया। जजों ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह तक साबित नहीं कर पाया कि धमाकों में किस तरह के बम का इस्तेमाल किया गया था।
क्या हुआ था 11 जुलाई 2006 को?
शाम के समय मुंबई की भीड़भाड़ वाली लोकल ट्रेनों में खार, बांद्रा, जोगेश्वरी, माहिम, माटुंगा, मीरा रोड और बोरीवली सहित सात जगहों पर RDX से विस्फोट किए गए। इन धमाकों में 180 से ज्यादा लोग मारे गए और 800 से अधिक घायल हुए। सिर्फ 11 मिनट में मुंबई थम सी गई थी।
ATS ने जांच करते हुए UAPA के तहत 13 आरोपियों पर चार्जशीट दाखिल की थी। 2015 में विशेष अदालत ने 12 को दोषी ठहराया, जबकि एक आरोपी वाहिद शेख को बरी कर दिया गया था। अब हाईकोर्ट के फैसले से बाकी 12 को भी राहत मिली है। यह फैसला एक बार फिर देश की जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली और न्याय प्रक्रिया पर कई सवाल खड़े करता है।