Summer express, नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की हालिया नीतिगत घोषणाओं और निवेश प्रोत्साहन उपायों से भारत में बड़े पैमाने पर विदेशी पूंजी निवेश आने की संभावना जताई जा रही है। विभिन्न वित्तीय संस्थानों की रिपोर्टों के अनुसार, इन कदमों के चलते देश में 50 से 75 अरब डॉलर तक का विदेशी निवेश आकर्षित हो सकता है, जिससे आर्थिक गतिविधियों को नई गति मिलने की उम्मीद है।
विशेषज्ञों का मानना है कि केंद्रीय बैंक के हालिया सुधार निवेशकों का भरोसा बढ़ाने, रुपये को मजबूती देने और सरकारी उधारी की लागत को नियंत्रित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। अनुमान है कि इन उपायों के प्रभाव से विदेशी निवेश का प्रवाह तेज होगा और वित्तीय बाजारों में स्थिरता आएगी।
इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) के सदस्यों के साथ देश की विकास दर को और मजबूत बनाने, निवेश बढ़ाने तथा कारोबारी माहौल को बेहतर करने को लेकर विस्तृत चर्चा की। बैठक में वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के बीच भारत की विकास गति बनाए रखने के लिए विभिन्न सुझावों और नीतिगत विकल्पों पर विचार-विमर्श किया गया।
बैठक के दौरान ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ और ‘ईज ऑफ लिविंग’ से जुड़े सुधारों पर विशेष जोर दिया गया। सरकार का मानना है कि निवेश आकर्षित करने के साथ-साथ जमीनी स्तर पर प्रशासनिक सुधार और प्रक्रियाओं को सरल बनाना भी आर्थिक विकास के लिए जरूरी है।
हालांकि, RBI ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए देश की आर्थिक विकास दर का अनुमान घटाकर 6.6 प्रतिशत कर दिया है। केंद्रीय बैंक ने वैश्विक मांग में कमजोरी, आपूर्ति शृंखला संबंधी चुनौतियों और मौसम से जुड़े संभावित जोखिमों को इसके पीछे प्रमुख कारण बताया है। वहीं खुदरा महंगाई का अनुमान बढ़ाकर 5.1 प्रतिशत कर दिया गया है।
बैठक में पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और उसके वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभावों पर भी गंभीर चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने प्रधानमंत्री के समक्ष भू-राजनीतिक तनाव से उत्पन्न संभावित आर्थिक चुनौतियों का आकलन प्रस्तुत किया, ताकि भविष्य की नीतियां अधिक प्रभावी ढंग से तैयार की जा सकें।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही में भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जबकि पूरे वित्त वर्ष के लिए यह 7.7 प्रतिशत रह सकती है। विनिर्माण और सेवा क्षेत्र देश की आर्थिक वृद्धि के प्रमुख आधार बने हुए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि विदेशी निवेश, बुनियादी ढांचे में सुधार, कारोबारी सुगमता और मजबूत घरेलू मांग के सहारे भारत वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बावजूद अपनी विकास गति को बनाए रखने में सक्षम हो सकता है।