Summer express, वॉशिंगटन। अमेरिका ने भारत सहित अपने प्रमुख व्यापारिक साझेदार देशों से आयात होने वाले उत्पादों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रस्ताव पेश किया है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि कई देशों ने कथित तौर पर जबरन मजदूरी से तैयार उत्पादों के आयात को रोकने के लिए पर्याप्त और प्रभावी कदम नहीं उठाए हैं। इसी आधार पर भारत पर 12.5 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाने का प्रस्ताव सामने आया है।
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (USTR) की ओर से जारी प्रस्ताव के अनुसार जांच में 54 ऐसी अर्थव्यवस्थाओं की पहचान की गई है, जहां जबरन श्रम से जुड़े उत्पादों के आयात पर प्रभावी नियंत्रण नहीं पाया गया। इस सूची में भारत के अलावा चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, वियतनाम, ताइवान, ब्राजील, स्विट्जरलैंड और ब्रिटेन जैसे देश भी शामिल हैं। इन देशों के उत्पादों पर 12.5 प्रतिशत अतिरिक्त आयात शुल्क लगाने का सुझाव दिया गया है।
वहीं, अमेरिका ने कुछ अन्य देशों के लिए 10 प्रतिशत टैरिफ लगाने का प्रस्ताव रखा है। इनमें कनाडा, मैक्सिको, यूरोपीय संघ (EU), इंडोनेशिया, इक्वाडोर और पाकिस्तान शामिल हैं। अमेरिकी जांच एजेंसियों का मानना है कि इन देशों ने नियम तो बनाए हैं, लेकिन उनके प्रभावी क्रियान्वयन में कमी रही है।
अमेरिका के शीर्ष व्यापार अधिकारी जेमिसन ग्रीर ने कहा कि कई व्यापारिक साझेदार देशों की नीतियों के कारण अमेरिकी श्रमिकों और उद्योगों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में असमान परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार को निष्पक्ष बनाने और श्रम मानकों को मजबूत करने के लिए और कड़े कदम उठाने की आवश्यकता है।
हालांकि प्रस्तावित टैरिफ व्यवस्था में कुछ उत्पादों को राहत देने की भी बात कही गई है। गोमांस, कॉफी, कुछ फल और मेवे, चुनिंदा वस्त्र एवं परिधान उत्पादों के अलावा कनाडा और मैक्सिको के मुक्त व्यापार समझौते के अंतर्गत आने वाले कुछ सामानों को संभावित छूट की श्रेणी में रखा गया है।
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय ने इस प्रस्ताव पर 6 जुलाई तक संबंधित पक्षों से सुझाव और आपत्तियां मांगी हैं। इसके बाद 7 जुलाई से सार्वजनिक सुनवाई की प्रक्रिया शुरू होने की संभावना है। बताया जा रहा है कि अमेरिकी प्रशासन ऐसे व्यापारिक उपायों को कानूनी रूप से अधिक मजबूत बनाने की दिशा में काम कर रहा है।
यदि यह प्रस्ताव अंतिम रूप से लागू होता है, तो अमेरिका को निर्यात करने वाले भारतीय उद्योगों, विशेष रूप से विनिर्माण और निर्यात क्षेत्र, पर अतिरिक्त लागत का दबाव बढ़ सकता है। हालांकि अभी यह केवल प्रस्ताव के स्तर पर है और सार्वजनिक परामर्श के बाद इसमें बदलाव की संभावना बनी हुई है।