Summer express, मोनिका रावत, चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने गायक-अभिनेता दिलजीत दोसांझ की फिल्म सतलुज को ओटीटी प्लेटफार्म से हटाए जाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका को वापस लेने की अनुमति देते हुए खारिज कर दिया। सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि जब फिल्म के निर्माता या निर्देशक स्वयं इस कार्रवाई को चुनौती देने के लिए आगे नहीं आए हैं, तो किसी तीसरे व्यक्ति द्वारा जनहित याचिका दायर करने का औचित्य क्या है।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस अश्विनी कुमार मिश्रा और जस्टिस रोहित कपूर की खंडपीठ के समक्ष पंजाब निवासी शरवन सिंह की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई हुई। याचिका में फिल्म को ओटीटी प्लेटफार्म से हटाए जाने को मनमाना और गैरकानूनी बताते हुए इसे दोबारा उपलब्ध कराने के निर्देश देने की मांग की गई थी।सुनवाई के दौरान पीठ ने सबसे पहले याचिकाकर्ता की लोकस स्टैंडी (याचिका दायर करने की पात्रता) पर सवाल उठाया। अदालत ने पूछा कि याचिकाकर्ता न तो फिल्म का निर्माता है और न ही निर्देशक, फिर वह इस मामले में जनहित याचिका कैसे दायर कर सकता है।इस पर याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया, हम याचिका वापस ले लेंगे और इसे निर्देशक के माध्यम से दायर करेंगे।
इसके बाद अदालत ने याचिका वापस लेने की अनुमति देते हुए उसे खारिज कर दिया।सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता धीरज जैन पेश हुए। उन्होंने याचिका का विरोध करते हुए कहा, इसमें जनहित का मुद्दा क्या है?” उन्होंने यह भी दलील दी कि याचिकाकर्ता का इस मामले में कोई अधिकार नहीं बनता।
उन्होंने अदालत को बताया कि याचिका में केवल इतना कहा गया है कि फिल्म हटाई गई, लेकिन यह नहीं बताया गया कि किस आदेश के तहत हटाई गई और उसका विवरण भी रिकार्ड पर नहीं रखा गया। उन्होंने यह भी बताया कि फिल्म को 5 जुलाई को प्लेटफार्म से हटाया गया था, जबकि 8 जुलाई को सीधे हाई कोर्ट में याचिका दायर कर दी गई। इससे पहले किसी सक्षम प्राधिकारी के समक्ष कोई प्रतिनिधित्व भी नहीं दिया गया।इस पर पीठ ने पूछा, क्या फिल्म के निर्देशक ने किसी प्राधिकरण के समक्ष कोई आवेदन दिया है? इस पर केंद्र सरकार की ओर से जवाब दिया गया कि ऐसा नहीं किया गया।याचिका में कहा गया था कि बिना किसी वैधानिक आदेश, न्यायिक निर्देश या सक्षम प्राधिकारी के आदेश का खुलासा किए फिल्म को हटाना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा जनता के सूचना प्राप्त करने के अधिकार का उल्लंघन है। साथ ही, उन दर्शकों के अधिकार भी प्रभावित हुए हैं जिन्होंने सदस्यता शुल्क देकर फिल्म देखने का अधिकार प्राप्त किया था।
याचिका में यह भी कहा गया था कि ‘सतलुज’ मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और वास्तविक घटनाओं पर आधारित बायोपिक है। फिल्म देश की संप्रभुता और अखंडता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालती और न ही सार्वजनिक व्यवस्था भंग करने का उद्देश्य रखती है।