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चन्नी गुट की ताकत का ग्राउंड रियलिटी चेक करेगा हाईकमान

समर न्यूज| लुधियाना

पंजाब कांग्रेस में अंदरूनी खींचतान के बीच पार्टी हाईकमान ने अब संगठन की जमीनी ताकत परखने की कवायद तेज कर दी है। पंजाब के प्रभारी भूपेश बघेल अगले 10 दिनों में प्रदेश के करीब 18 जिलों का दौरा कर नेताओं और कार्यकर्ताओं से सीधे फीडबैक लेंगे।
इस दौरान वह यह जानने की कोशिश करेंगे कि पार्टी के भीतर अलग-अलग गुटों की वास्तविक पकड़ कितनी है और 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस को मजबूत करने के लिए किन स्तरों पर बदलाव की जरूरत है। बघेल का यह प्रयास ऐसे समय हो रहा है, जब पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के नेतृत्व वाला खेमे और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग के बीच मतभेद सार्वजनिक चर्चा का विषय बने हुए हैं।
सूत्रों के अनुसार बघेल का दौरा केवल संगठनात्मक बैठक तक सीमित नहीं रहेगा। वह जिला स्तर के नेताओं, मौजूदा और पूर्व विधायकों, सांसदों और पार्टी के प्रमुख कार्यकर्ताओं से मुलाकात कर स्थानीय राजनीतिक समीकरणों की जानकारी लेंगे। इसके जरिए हाईकमान यह भी आकलन करना चाहता है कि चुनावी मैदान में किस नेता की स्वीकार्यता कितनी है और किन क्षेत्रों में कांग्रेस का संगठन सक्रिय है। पार्टी के भीतर टिकट वितरण और उम्मीदवारों की जीत की संभावना को लेकर भी इस फीडबैक को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
{चन्नी खेमे की नाराजगी के बीच संतुलन की कोशिश: पंजाब कांग्रेस में विवाद उस समय तेज हुआ, जब हाईकमान ने राजा वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष पद पर बनाए रखने का फैसला किया। चन्नी खेमे के नेताओं ने नेतृत्व को लेकर अपनी आपत्तियां जताईं और पार्टी की चुनावी संभावनाओं पर इसके असर की आशंका व्यक्त की। हालांकि, हाईकमान ने प्रदेश नेतृत्व में बदलाव की संभावना को फिलहाल खारिज कर दिया है। बघेल भी साफ कर चुके हैं कि पार्टी नेतृत्व का फैसला हो चुका है और इसे बार-बार बदलना आसान प्रक्रिया नहीं है। इसके बावजूद चन्नी खेमे की राजनीतिक ताकत को नजरअंदाज करना हाईकमान के लिए आसान नहीं है। चन्नी पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री और जालंधर से लोकसभा सांसद हैं।
उनके साथ कई वरिष्ठ नेता और विधायक जुड़े माने जाते हैं। हालिया बैठकों में इस खेमे के नेताओं ने अपनी चिंताओं को बघेल के सामने रखने की कोशिश की है। इससे संकेत है कि पार्टी नेतृत्व अब टकराव बढ़ाने के बजाय सभी गुटों को साथ लेकर आगे बढ़ने की रणनीति पर काम कर रहा है। बघेल की प्रस्तावित जिला यात्रा को इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
हाईकमान के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि चन्नी खेमे की वास्तविक पकड़ कितनी है और उसकी राजनीतिक अपील किन क्षेत्रों तक सीमित है। जमीनी फीडबैक से यह भी पता लगाने की कोशिश होगी कि पार्टी के भीतर चल रही गुटबाजी का असर आम कार्यकर्ता और संभावित मतदाता पर कितना पड़ रहा है।
{राहुल गांधी की रैलियों की तैयारी: भूपेश बघेल के दौरे का एक अहम उद्देश्य पंजाब में कांग्रेस के आगामी कार्यक्रमों और राष्ट्रीय नेताओं की संभावित जनसभाओं के लिए आधार तैयार करना भी बताया जा रहा है। फीडबैक के आधार पर राहुल गांधी की रैलियों और जनसंपर्क कार्यक्रमों का प्रारूप तैयार किया जा सकता है।
पार्टी ऐसे क्षेत्रों की पहचान करना चाहती है, जहां कांग्रेस संगठन अपेक्षाकृत मजबूत है और जहां बड़े राजनीतिक कार्यक्रमों का चुनावी असर अधिक हो सकता है। कांग्रेस के लिए पंजाब इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2027 के विधानसभा चुनाव में वह आम आदमी पार्टी के खिलाफ मजबूत चुनौती पेश करने की तैयारी कर रही है। पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी को बड़ा नुकसान हुआ था, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में उसने राज्य में सात सीटें जीतकर अपनी राजनीतिक वापसी के संकेत दिए। ऐसे में हाईकमान अब लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन को विधानसभा स्तर पर दोहराने की रणनीति पर काम कर रहा है।
{असली परीक्षा गुटबाजी से ऊपर संगठन की: बघेल के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी के भीतर जारी मतभेदों को चुनावी रणनीति में बदलने की है। यदि जिला स्तर पर नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय कायम नहीं हुआ तो केवल बड़े नेताओं की रैलियां कांग्रेस को अपेक्षित लाभ नहीं दिला पाएंगी। इसलिए 18 जिलों से मिलने वाला फीडबैक उम्मीदवार चयन, संगठनात्मक नियुक्तियों और चुनावी मुद्दों की प्राथमिकता तय करने में महत्वपूर्ण हो सकता है। पंजाब कांग्रेस नेतृत्व के सामने फिलहाल दो मोर्चे हैं। एक ओर चन्नी समेत विभिन्न नेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और गुटीय समीकरणों को साधना है, वहीं दूसरी ओर राजा वड़िंग के नेतृत्व में संगठन को एकजुट कर चुनावी तैयारी तेज करनी है। बघेल का जमीनी दौरा इसी संतुलन की परीक्षा माना जा रहा है। यदि हाईकमान को जिला स्तर पर यह भरोसा मिलता है कि पार्टी के सभी प्रमुख चेहरे एकजुट होकर चुनाव लड़ सकते हैं, तो राहुल गांधी समेत केंद्रीय नेताओं के कार्यक्रमों के जरिए अभियान को गति दी जा सकती है। लेकिन यदि गुटबाजी जमीनी संगठन तक पहुंची मिली, तो कांग्रेस को चुनाव से पहले ही नेतृत्व और रणनीति के स्तर पर नई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

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