Summer express, मोनिका रावत , चंडीगढ़ I नौ साल पुराने एक देह व्यापार के मामले में तीन आरोपित सबूतों के अभाव के चलते जिला अदालत से बरी हो गए। इस केस में पुलिस की भी बड़ी लापरवाही सामने आई। जिस डीएसपी ने इस गिरोह का पर्दाफाश किया था, वह क्रास एग्जामिनेशन के लिए अदालत में पेश ही नहीं हुए। इसका लाभ आरोपितों को हुआ और पुलिस ने उन्हें बरी कर दिया। बरी होने वालों में सेक्टर-41 निवासी सुलक्खन सिंह उर्फ सुक्खी, दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल निवासी योगिता तामंग और बलटाना निवासी गुरदर्शन सिंह शामिल हैं। इस केस में दो युवतियां भी आरोपित थीं, लेकिन वह कभी अदालत में पेश नहीं हुई तो उन्हें भगोड़ा घोषित कर दिया गया था।
नवंबर 2017 में पुलिस को गुप्ता सूचना मिली थी कि एक गिरोह कार में घूमता है और लड़कियां सप्लाई करता है। पुलिस ने तत्कालीन डीएसपी दीपक यादव की अगुवाई में आइएसबीटी, सेक्टर-43 के पास एक फर्जी कस्टमर भेजकर गिरोह में शामिल आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया। इनमें तीन युवतियां भी थीं। पुलिस ने इनके खिलाफ इमोरल ट्रैफिक प्रिवेंशन एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत केस दर्ज कर लिया। इसके बाद डीएसपी दीपक यादव की दिल्ली में ट्रांसफर हो गई। वहां उन्होंने एडिशनल डीसीपी के पद पर जाइन कर लिया I
कोर्ट ने कहा-ऐसी गवाही अधूरी और एकतरफा
ट्रायल के दौरान डीएसपी दीपक यादव गवाही देने के लिए अदालत में पेश हुए थे। उन्होंने पूरे मामले को अदालत के समक्ष रखा और बताया कि किस तरह उन्होंने गुप्त सूचना के आधार पर इस रैकेट को पकड़ा था, लेकिन 30 सितंबर 2023 को उन्हें क्रास एग्जामिनेशन के लिए फिर से अदालत में पेश होना था, जहां वह गैर हाजिर हो गए। बचाव पक्ष के वकीलों को उनसे सवाल-जवाब करने का मौका ही नहीं मिला। इतना ही नहीं, वह पूरे मुकदमे के दौरान दोबारा अदालत में दोबारा कभी पेश नहीं हुए, जबकि वह खुद इस केस के शिकायतकर्ता और जांच अधिकारी थे। ऐसे में अदालत ने कहा कि किसी मामले के मुख्य गवाह या शिकायतकर्ता की जिरह नहीं होने पर उसकी गवाही अधूरी और एकतरफा रहती है। ऐसे बयान को आरोपितों के खिलाफ सबूतों के तौर पर माना नहीं जा सकता। ऐसे में अदालत ने आरोपितों को संदेह का लाभ दिया।
कोर्ट ने पूछा पीड़ित कौन, पुलिस के पास नहीं था जवाब
अदालत ने फैसले में अभियोजन की कहानी पर एक अहम सवाल उठाया। पुलिस के अनुसार छापेमारी के दौरान तीन लड़कियां कार में मिली थीं और आरोप था कि उन्हें देह व्यापार के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था, लेकिन तीनों लड़कियों को ही इस मामले में आरोपित बनाया गया था। अदालत ने पूछा कि यदि वह तीनों आरोपित थीं तो पीड़ित कौन थी। अभियोजन यह भी साबित नहीं कर सका कि किस लड़की को देह व्यापार के लिए लाया गया था। इसके अलावा पुलिस के पास कोई स्वतंत्र गवाह भी नहीं था। जिससे पुलिस का केस काफी कमजोर पड़ गया।