Summer express, मोनिका रावत, चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने 75 वर्ष से अधिक उम्र के बीमार कैदियों की जमानत याचिकाओं को लेकर अहम टिप्पणी की है। हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में जमानत खारिज करने से पहले संबंधित न्यायाधीश में ‘न्याय करने की रीढ़’ होनी चाहिए। अदालत को बुजुर्ग अवस्था और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों पर अत्यंत सहानुभूति और चिंता के साथ विचार करना चाहिए और जमानत न देने के कारण आदेश में स्पष्ट रूप से दर्ज करने चाहिए।
जस्टिस अनूप चितकारा और जस्टिस हरमीत सिंह देओल की खंडपीठ ने यह टिप्पणी धन शोधन मामले में पांच वर्ष से अधिक समय से जेल में बंद 76 वर्षीय आरोपित देव को अंतरिम जमानत देते हुए की, उसके खिलाफ इडी ने फतेहगढ़ पुलिस स्टेशन मामला दर्ज किया था। । आरोपित की ओर से अदालत को बताया गया कि उसकी हालत इतनी खराब है कि वह अपनी निजी जरूरतों तक की देखभाल करने में सक्षम नहीं है। ऐसे में लगातार जेल में रखना उसके और उसके परिवार के साथ अपूरणीय अन्याय होगा।
खंडपीठ ने कहा कि अस्वस्थ वृद्धावस्था अपने आप में एक अभिशाप है। ऐसे मध्यम वृद्ध या अत्यधिक बीमार व्यक्ति को जमानत देने से इनकार करना अमानवीय हो सकता है, जिसके लिए जेल की चारदीवारी के बाहर बेहतर उपचार जरूरी हो। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि बार-बार अपराध करने वाले, सुधार से इनकार करने वाले, फरार होने की आशंका वाले या अत्यंत जघन्य एवं क्रूर अपराध के आरोपितों के मामले अलग हो सकते हैं।
अदालत ने कहा कि किसी बंदी को जेल में रखने के पीछे निरोध, दंड, समाज की सुरक्षा और कानून के उल्लंघन के खिलाफ संदेश देने जैसे उद्देश्य होते हैं। पीड़ितों में न्याय व्यवस्था के प्रति भरोसा कायम रखना भी इसका हिस्सा है। लेकिन जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुके बीमार और कमजोर बुजुर्ग बंदी के मामले में जेल में रखने का उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाता है।प्रवर्तन निदेशालय ने जमानत का विरोध करते हुए धन शोधन निवारण कानून की धारा 45 की कठोर दोहरी शर्तों का हवाला दिया। एजेंसी ने आरोपित पर वर्ष 2016 से समन से बचने का आरोप लगाते हुए उसके फरार होने की आशंका भी जताई। यह भी कहा गया कि भारत में कुछ संपत्तियां उसके बेटे के नाम खरीदी गई हैं, जो मामले में आरोपित है और फरार बताया गया है।
हालांकि अदालत ने पाया कि एजेंसी ने आरोपित की चिकित्सा स्थिति का विशेष रूप से खंडन नहीं किया। अदालत ने 17 अगस्त के हिरासत प्रमाणपत्र का भी संज्ञान लिया, जिसमें पांच वर्ष से अधिक की हिरासत दर्ज थी। खंडपीठ ने कहा कि उसे केवल अधिक उम्र और खराब स्वास्थ्य के आधार पर ही नहीं, बल्कि लंबे समय से जारी हिरासत के आधार पर भी राहत मिलनी चाहिए।हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धन शोधन निवारण कानून की कठोर शर्तें ऐसी चिकित्सा परिस्थितियों में संविधान के अनुच्छेद 21 के अधिकार पर हावी नहीं हो सकतीं। यदि जेल के भीतर उपचार केवल औपचारिकता बनकर रह जाए और व्यक्ति गंभीर रूप से अस्वस्थ हो, तो जमानत से इनकार करना जीवन के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है।खंडपीठ ने 76 वर्षीय आरोपित को 21 दिसंबर तक अंतरिम जमानत प्रदान की।