summer express,चंडीगढ़। पंजाब रोडवेज के कंडक्टर को विभागीय अनियमितता के मामले में दस साल तक न्यूनतम वेतनमान पर रखने की सजा के खिलाफ दायर याचिका पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने खारिज कर दी। जस्टिस कीर्ति सिंह ने कहा कि विभागीय जांच के दौरान कर्मचारी को अपना पक्ष रखने, गवाहों से जिरह करने और बचाव में साक्ष्य पेश करने का पर्याप्त अवसर दिया गया था। इसलिए हाई कोर्ट विभागीय जांच के निष्कर्षों का अपीलीय प्राधिकारी की तरह दोबारा मूल्यांकन नहीं कर सकता।
मामला वर्ष 1997 की दो अलग-अलग घटनाओं से जुड़ा है। पहली घटना में बटाला से मेहता जा रही बस की जांच के दौरान 12 यात्री बिना टिकट मिले थे। आरोप था कि कंडक्टर ने यात्रियों से चार-चार रुपये लेकर टिकट जारी नहीं किए, जिससे 48 रुपये के गबन का आरोप लगा। कंडक्टर ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा था कि वह यात्रियों को टिकट जारी करने की प्रक्रिया में था। उसने बस चालक सुरजीत सिंह को बचाव गवाह के तौर पर पेश किया, लेकिन जांच अधिकारी ने आरोप सिद्ध मानते हुए 8 अप्रैल 1997 को तीन वेतनवृद्धियां संचयी प्रभाव से रोकने की सजा दी।
दूसरी घटना खरड़ की थी। जांच के दौरान 14 यात्री बिना टिकट मिले थे और उनके 522 रुपये के किराये से संबंधित आरोप कंडक्टर पर लगाया गया। कंडक्टर ने सफाई दी कि ये यात्री दूसरी निजी बस का टायर पंक्चर होने के बाद उसकी बस में सवार हुए थे और उसने उनसे किराया लिया ही नहीं था। चालक गुरमुख सिंह ने भी उसके पक्ष में गवाही दी, लेकिन जांच अधिकारी ने आरोप सिद्ध मानते हुए 12 मई 1997 को उसे दस वर्ष तक वेतनमान के न्यूनतम स्तर पर रखने की सजा दी।
कंडक्टर ने विभागीय सजा को औद्योगिक न्यायाधिकरण, गुरदासपुर में चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने वर्ष 2015 में न्यायाधिकरण के फैसले को रद्द कर मामला पुनर्विचार के लिए भेजा था। अदालत ने यह स्पष्ट करने को कहा था कि दस वर्ष तक न्यूनतम वेतनमान पर रखने की सजा का उस अवधि की वार्षिक वेतनवृद्धियों और भविष्य की वेतनवृद्धियों पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
पुनर्विचार के बाद न्यायाधिकरण ने स्पष्ट किया कि सजा की अवधि के दौरान वार्षिक वेतनवृद्धियां नहीं मिलेंगी, लेकिन दस वर्ष की अवधि समाप्त होने के बाद कर्मचारी को आगे देय वेतनवृद्धियां मिल सकेंगी। हाई कोर्ट ने माना कि न्यायाधिकरण ने उसके आदेश के अनुरूप मामले पर स्पष्ट निष्कर्ष दिया है।
कंडक्टर ने यात्रियों से पूछताछ नहीं करने, नकदी की जांच न किए जाने और बचाव पक्ष के चालकों की गवाही को स्वीकार नहीं करने की दलील भी दी। हाई कोर्ट ने कहा कि इन आधारों से प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन या कर्मचारी को अपना बचाव करने का पर्याप्त अवसर न मिलने की बात साबित नहीं होती।
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में न्यायाधिकरण द्वारा हाई कोर्ट के पुराने आदेश की अवहेलना, अधिकार क्षेत्र संबंधी त्रुटि, फैसले में विकृति या प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन का आधार नहीं मिला। इसके चलते हाई कोर्ट ने 12 जुलाई 2016 के औद्योगिक न्यायाधिकरण के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी।