गुरु गोबिंद सिंह की पंक्ति से मिली प्रेरणा: इम्तियाज अली
समर न्यूज | कसौली
फिल्मकार इम्तियाज अली ने कहा कि पंजाब से उनका कोई पारिवारिक रिश्ता नहीं है, लेकिन यहां की संस्कृति और लोगों से उनका भावनात्मक जुड़ाव लगातार गहरा हुआ है। कसौली में आयोजित 15वें खुशवंत सिंह साहित्य समारोह में शुक्रवार शाम बातचीत के दौरान उन्होंने अपनी फिल्मों में पंजाबी किरदारों की मौजूदगी, फिल्म ‘तमाशा’ की प्रेरणा और अपनी हालिया फिल्म ‘मैं वापस आऊंगा’ के पीछे की सोच साझा की।
यह पूछे जाने पर कि उनकी कई फिल्मों में पंजाबी किरदार क्यों दिखाई देते हैं, अली ने कहा कि वह खुद भी इस बात को समझने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि उन्हें पहली भारतीय महिला विमान चालक के बारे में पढ़ते हुए पंजाब से जुड़े इस पहलू का ख्याल आया और मजाक में कहा कि शायद उनकी आत्मा उनमें आ गई हो। ‘जब वी मेट’, ‘अमर सिंह चमकीला’, ‘जब हैरी मेट सेजल’ और ‘मैं वापस आऊंगा’ जैसी फिल्मों में पंजाबी परिवेश या किरदार नजर आते हैं।
{‘तमाशा’ की प्रेरणा: अली ने बताया कि फिल्म ‘तमाशा’ का नाम गुरु गोबिंद सिंह की पंक्ति ‘मैं हूं परम पुरुष को दासा, देखन आयो जगत तमाशा’ से प्रेरित है। उनके मुताबिक, यह पंक्ति फिल्म के विचार से जुड़ती है। उन्होंने कहा कि फिल्में केवल वही बातें सिखाने या बताने के लिए नहीं बननी चाहिए, जिन्हें दर्शक पहले से जानते हैं। कहानी लिखने की शुरुआत अक्सर किसी ऐसे सवाल या जिज्ञासा से होती है, जिसका जवाब खुद लेखक के पास भी पूरी तरह नहीं होता। इसी जिज्ञासा से कल्पना और कहानी आगे बढ़ती है।
{विभाजन की यादों को सहेजने की कोशिश: अपनी फिल्म ‘मैं वापस आऊंगा’ पर बात करते हुए अली ने कहा कि इसे बनाने की प्रेरणा पंजाब में शूटिंग के दौरान 1947 के विभाजन को अपनी आंखों से देखने वाले बुजुर्गों से मिली बातचीत से आई। उन्होंने उनकी यादों में दर्ज प्रेम, पुराने घरों और बिछड़े लोगों की कहानियां सुनीं। फिल्म में ऐतिहासिक घटनाओं की पृष्ठभूमि के साथ काल्पनिक पात्रों और प्रसंगों को जोड़ा गया है। अली ने इसे तथ्य व कल्पना के मेल के रूप में समझाया।
{नफरत नहीं, इंसानी अनुभव अहम: अली ने विभाजन के दौरान हुई हिंसा और विस्थापन को याद करते हुए कहा कि उस दौर की कहानियों को भुलाना नहीं चाहिए। उनके अनुसार, बुजुर्गों की स्मृतियों में केवल हिंसा ही नहीं, बल्कि प्रेम और अपनापन भी जीवित है। उन्होंने कहा कि विभाजन के नुकसान को स्वीकार करना जरूरी है, ताकि इतिहास की ऐसी त्रासदी दोहराए जाने से रोका जा सके। भाषा, संस्कृति और साझा विरासत का नुकसान भी इस इतिहास का हिस्सा है।