Bilaspur, Subhash-:चार महीने तक जल समाधि में रहने के बाद केहलुर रियासत के ऐतिहासिक मंदिर अब फिर से भाखड़ा डैम के पानी से बाहर दिखाई दे रहे हैं। जलस्तर घटने के साथ मंदिरों का ऊपरी हिस्सा और उनके आसपास जमा गाद स्पष्ट रूप से नजर आने लगी है। यह दृश्य जितना भावुक करता है, उतना ही यह दशकों पुरानी सरकारी उदासीनता और संरक्षण के अभाव को भी उजागर करता है।
1500 करोड़ की योजना फाइलों में कैद
केहलुर रियासत के ये मंदिर हर साल भाखड़ा बांध के जलाशय में डूबते और फिर बाहर आते रहे हैं। हालांकि केंद्र सरकार ने इन धरोहरों को सुरक्षित स्थान पर पुनर्स्थापित करने के लिए लगभग 1500 करोड़ रुपये की योजना बनाई थी, लेकिन इतने वर्षों के बाद यह योजना केवल कागजों तक ही सीमित रही। न तो लिफ्टिंग का काम शुरू हुआ, न स्थायी संरक्षण का कोई ठोस प्रयास किया गया।भाखड़ा बांध के निर्माण को 65 साल हो चुके हैं, और इस दौरान मंदिर लगातार पानी में डूबते और बाहर आते रहे हैं। इस ऐतिहासिक विरासत की जर्जर हालत अब साफ नजर आ रही है। यदि अब भी प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो केहलुर रियासत के ये मंदिर केवल यादों तक सिमट कर रह जाएंगे।
स्थानीय इतिहासकार और पत्रकार संदीप सांख्यान का कहना है कि “यह केवल एक ऐतिहासिक समस्या नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और धरोहर के प्रति गंभीर उपेक्षा का प्रतीक है।”सालों से लटके योजनाओं और अधूरे प्रयासों के बावजूद, केहलुर रियासत के ये मंदिर हमारी जागरूकता और संरक्षण के प्रति गंभीर चेतावनी दे रहे हैं। अब समय है कि सरकार और संबंधित संस्थान इस विरासत को बचाने के लिए ठोस और त्वरित कदम उठाएं।