Summer express, चंडीगढ़ | हरियाणा की अनाज मंडियों में इन दिनों फैली अव्यवस्थाओं को लेकर राजनीतिक माहौल गर्म हो गया है। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी अनुराग ढांडा ने चंडीगढ़ में प्रदेश की भाजपा सरकार और मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी पर सीधा हमला बोलते हुए मंडियों की मौजूदा स्थिति को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
ढांडा ने कहा कि प्रदेश का प्रशासनिक तंत्र पूरी तरह से विफल साबित हो रहा है और किसानों को उनकी फसल के उचित प्रबंधन के लिए जरूरी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं कराई जा रही हैं। पार्टी के अनुसार, बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि से पहले ही किसान नुकसान झेल रहे थे, लेकिन सरकार की लापरवाही ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।
उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि मार्च और अप्रैल 2026 के दौरान हरियाणा में सामान्य से करीब 70 प्रतिशत अधिक बारिश दर्ज की गई, जिससे लगभग 23 लाख हेक्टेयर कृषि क्षेत्र प्रभावित हुआ है। अगेती फसलों को भी 10 से 15 प्रतिशत तक नुकसान हुआ है।
ढांडा ने आरोप लगाया कि इन परिस्थितियों के बावजूद मंडियों में फसल को सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त तिरपाल और शेड की व्यवस्था नहीं की गई। मंडियों में गेहूं के ढेर खुले में पड़े हैं, जिससे लाखों क्विंटल अनाज बारिश में भीगकर खराब होने के कगार पर पहुंच गया है।
उन्होंने सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब मौसम विभाग पहले ही भारी बारिश और ओलावृष्टि का अलर्ट जारी कर चुका था, तब भी तैयारियां क्यों नहीं की गईं। साथ ही उन्होंने ‘12 प्रतिशत नमी’ के नियम को किसानों के खिलाफ बताया और कहा कि इसी बहाने खरीद प्रक्रिया को धीमा किया जा रहा है।
प्रदेश की प्रमुख अनाज मंडियों जैसे कुरुक्षेत्र, कैथल, रोहतक, पानीपत, जींद और हिसार में स्थिति बेहद खराब बताई जा रही है। बायोमेट्रिक गेट पास प्रणाली के बार-बार फेल होने से किसानों को लंबी कतारों में इंतजार करना पड़ रहा है। वहीं पोर्टल की खराबी और आढ़तियों की हड़ताल के कारण खरीद और उठान की प्रक्रिया भी प्रभावित हुई है।
AAP ने मांग की है कि मंडियों में तुरंत तिरपाल और वाटरप्रूफ शेड की व्यवस्था की जाए, नमी के नियमों में ढील देकर फसल की तुरंत खरीद सुनिश्चित की जाए, बायोमेट्रिक प्रणाली को दुरुस्त किया जाए और बारिश से खराब हुई फसलों के लिए किसानों को उचित मुआवजा दिया जाए।
ढांडा ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने जल्द सुधार नहीं किया तो किसानों का आक्रोश बढ़ सकता है और इसका असर सरकार को भुगतना पड़ेगा।