Summer express, चंडीगढ़ | हरियाणा सहित उत्तर भारत के कई राज्यों में फसल अवशेष (फाने) जलाने पर लगे प्रतिबंध और जुर्माने के प्रावधान प्रभावहीन साबित हो रहे हैं। प्रदेश में इस वर्ष ऐसे मामलों में करीब सात गुना वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे पर्यावरण और स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।
आंकड़ों के अनुसार एक अप्रैल से अब तक हरियाणा में 1709 स्थानों पर फसल अवशेष जलाने के मामले सामने आए हैं, जबकि पंजाब में 1759, उत्तर प्रदेश में 13,378, मध्य प्रदेश में 32,369 और दिल्ली में 28 घटनाएं दर्ज की गई हैं। केवल हरियाणा में 144 स्थानों पर आग लगाने की घटनाएं सामने आईं।
विशेषज्ञों के अनुसार, किसान अगली फसल की बुवाई के लिए खेत जल्द खाली करने के दबाव में अवशेषों को आग लगा रहे हैं। यह स्थिति तब है जब सरकार ने फसल अवशेष जलाने पर सख्त दंडात्मक प्रावधान लागू कर रखे हैं। दो एकड़ तक पांच हजार, पांच एकड़ तक 10 हजार और इससे अधिक भूमि पर 30 हजार रुपये तक जुर्माने के साथ एफआईआर दर्ज करने का भी प्रावधान है।
सरकार ने “मेरी फसल-मेरा ब्योरा” पोर्टल के माध्यम से अब तक 552 किसानों के रिकॉर्ड में रेड एंट्री दर्ज की है। ऐसे किसानों को दो सीजन तक न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर फसल बेचने से वंचित किया जा सकता है। साथ ही उन्हें सब्सिडी और कृषि यंत्रों पर मिलने वाली छूट से भी वंचित रखा जाएगा।
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि फसल अवशेष जलाने से वायु प्रदूषण तेजी से बढ़ता है, जिससे सांस संबंधी बीमारियां, आंखों में जलन और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं पैदा होती हैं। इसके अलावा मिट्टी की उर्वरता पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है, क्योंकि इससे पोषक तत्व और सूक्ष्म जीव नष्ट हो जाते हैं।
जिलावार आंकड़ों में जींद (293) और रोहतक (277) में सबसे अधिक मामले सामने आए हैं, जबकि सोनीपत (140), कैथल (123), करनाल (117) और सिरसा (108) भी प्रभावित जिलों में शामिल हैं।
सख्त नियमों और निगरानी के बावजूद बढ़ते मामलों ने सरकारी रणनीति और जागरूकता अभियानों की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल दंडात्मक कार्रवाई के बजाय किसानों को वैकल्पिक समाधान उपलब्ध कराना जरूरी है, तभी इस समस्या पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है।