कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की वैश्विक दौड़ में चीन ने एक बार फिर अपनी मौजूदगी मजबूत कर दी है। चीनी एआई कंपनी जिपू एआई ने अपना नया ओपन-वेट एआई मॉडल जीएलएम-5.2 पेश किया है। शुरुआती परीक्षणों में दावा किया गया है कि यह मॉडल साइबर सुरक्षा, कोड विश्लेषण और सॉफ्टवेयर में खामियां खोजने जैसे विशेष क्षेत्रों में अमेरिकी अग्रणी मॉडलों को कड़ी चुनौती दे सकता है। हालांकि व्यापक उपयोग और सामान्य क्षमता के मामले में अमेरिकी कंपनियों के सबसे उन्नत एआई मॉडल अभी भी आगे माने जा रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि चीन का नया मॉडल इस बात का संकेत है कि अमेरिकी निर्यात प्रतिबंधों और उन्नत चिप्स पर नियंत्रण के बावजूद चीन ने एआई अनुसंधान और विकास की गति बनाए रखी है।
चीन की रणनीति केवल सबसे शक्तिशाली मॉडल बनाना नहीं, बल्कि कम लागत, अधिक उपलब्धता और बड़े पैमाने पर व्यावसायिक उपयोग पर भी केंद्रित है। यही कारण है कि चीनी एआई मॉडल दुनिया के कई बाजारों में तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं।
अमेरिका लंबे समय से उन्नत एआई तकनीक को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा विषय मानता रहा है। हाल के महीनों में अमेरिकी प्रशासन ने अपनी सबसे उन्नत एआई प्रणालियों तक पहुंच को नियंत्रित करने के लिए कई कदम उठाए हैं। कुछ अत्याधुनिक मॉडलों की उपलब्धता केवल चुनिंदा और अधिकृत संस्थानों तक सीमित की गई है। अधिकारियों का मानना है कि ऐसी तकनीक का दुरुपयोग साइबर हमलों और संवेदनशील बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाने में हो सकता है।
ओपन-वेट मॉडल विकसित करने पर जोर
दूसरी ओर, चीन ओपन-वेट मॉडल विकसित करने पर जोर दे रहा है। इन मॉडलों को शोधकर्ता और डेवलपर अपेक्षाकृत आसानी से डाउनलोड कर अपने सिस्टम पर चला सकते हैं। समर्थकों का कहना है कि इससे नवाचार को बढ़ावा मिलता है, जबकि आलोचकों का तर्क है कि ऐसे मॉडल गलत हाथों में पड़ने पर साइबर अपराधियों द्वारा भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं। एआई विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा अब केवल तकनीकी क्षमता तक सीमित नहीं है। यह चिप निर्माण, सुपरकंप्यूटिंग, डेटा सेंटर, क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक बाजारों में हिस्सेदारी की लड़ाई भी बन चुकी है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, चीन घरेलू एआई चिप्स और सुपरकंप्यूटिंग क्षमता बढ़ाने में भी तेजी से निवेश कर रहा है, जिससे तकनीकी आत्मनिर्भरता को बल मिल रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि चीन ने अमेरिका को पूरी तरह पीछे छोड़ दिया है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि दोनों देशों के बीच तकनीकी अंतर पहले की तुलना में कम हुआ है। आने वाले वर्षों में एआई क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा और तेज होने की संभावना है, जिसका असर वैश्विक तकनीक, व्यापार, साइबर सुरक्षा और डिजिटल अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देगा।