summer express मोनिका रावत , चंडीगढ़। पंजाब के राज्यपाल एवं यूटी चंडीगढ़ के प्रशासक गुलाब चंद कटारिया ने गुरुवार को वेटलैंड अथॉरिटी, चंडीगढ़ की पांचवीं बैठक की अध्यक्षता करते हुए राष्ट्रीय महत्व के सुखना वेटलैंड के संरक्षण और वैज्ञानिक प्रबंधन की व्यापक समीक्षा की। उन्होंने संबंधित विभागों को समन्वित प्रयासों के माध्यम से सुखना वेटलैंड और उसके कैचमेंट क्षेत्र की पारिस्थितिकी को दीर्घकालिक रूप से सुरक्षित रखने के निर्देश दिए।
बैठक में वेटलैंड अथॉरिटी की पिछली बैठक के निर्णयों पर हुई कार्रवाई की समीक्षा की गई तथा अथॉरिटी के आधिकारिक लोगो को अंतिम मंजूरी दी गई। विभिन्न विभागों ने सुखना वेटलैंड के संरक्षण, पारिस्थितिकीय पुनर्स्थापन और कैचमेंट क्षेत्र के वैज्ञानिक प्रबंधन पर अपनी प्रस्तुतियां दीं। कांसल डायवर्जन नहर के रखरखाव और मृदा अपरदन रोकने के लिए व्यापक अध्ययन कराने के प्रस्ताव पर भी चर्चा हुई।
प्रशासक ने वेटलैंड में खरपतवार प्रबंधन के लिए वैज्ञानिक एवं पर्यावरण-अनुकूल तरीकों को अपनाने पर बल दिया ताकि जलीय जैव विविधता प्रभावित हुए बिना पारिस्थितिकीय संतुलन बनाए रखा जा सके। उन्होंने प्रवासी पक्षियों की संख्या और विविधता बढ़ाने के लिए उनके प्राकृतिक आवास को बेहतर बनाने तथा वेटलैंड परिसर में विभिन्न प्रवासी पक्षियों की जानकारी देने वाले सूचना पैनल लगाने के निर्देश भी दिए।
बैठक में बताया गया कि पंजाब विश्वविद्यालय के प्राणी विज्ञान विभाग द्वारा किए गए मत्स्य विविधता सर्वेक्षण में सुखना वेटलैंड में 20 से अधिक मछली प्रजातियां दर्ज की गई हैं, जिनमें मृगल कार्प सबसे अधिक पाई गई। सर्वेक्षण के अनुसार कुल मत्स्य विविधता में 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी देशी प्रजातियों की है। इस के आधार पर मत्स्य विभाग ने कतला, रोहू और मृगल की 10 हजार फिंगरलिंग्स वेटलैंड में छोड़ी हैं।
बैठक में यह भी जानकारी दी गई कि Indian Institute of Technology Roorkee की सिफारिशों और WWF-India के परामर्श के अनुसार सुखना वेटलैंड के रेगुलेटरी छोर पर वैज्ञानिक तरीके से डी-सिल्टिंग का कार्य जारी है। इस परियोजना से वेटलैंड की जल भंडारण क्षमता में लगभग 5.4 हेक्टेयर-मीटर की वृद्धि होने की संभावना है।
बैठक में यूटी के मुख्य सचिव एच. राजेश प्रसाद सहित विभिन्न विभागों के वरिष्ठ अधिकारी और विशेषज्ञ भी मौजूद रहे।