Summer express, मोनिका रावत, चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अनुकंपा नियुक्ति सरकारी या बैंक सेवा में भर्ती का वैकल्पिक माध्यम अथवा कर्मचारी के आश्रित का निहित अधिकार नहीं है। इसका उद्देश्य केवल कर्मचारी की आकस्मिक मृत्यु के बाद आर्थिक संकट से जूझ रहे परिवार को तत्काल राहत प्रदान करना है। यदि मृत्यु के दो दशक बाद अनुकंपा नियुक्ति की मांग की जाती है तो उसका मूल उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है।
जस्टिस संदीप मौदगिल ने यह टिप्पणी करते हुए पंजाब नेशनल बैंक में चपरासी के पद पर अनुकंपा नियुक्ति की मांग करने वाले होशियारपुर निवासी दीपक मनहास की याचिका खारिज कर दी।
याचिकाकर्ता के पिता ओरिएंटल बैंक आफ कॉमर्स (अब पंजाब नेशनल बैंक में विलय) में आर्म्ड गार्ड के पद पर कार्यरत थे। 24 मार्च 2003 को सेवा के दौरान एक सड़क दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि उस समय वह नाबालिग था और बैंक ने आश्वासन दिया था कि बालिग होने पर उसे अनुकंपा नियुक्ति पर विचार किया जाएगा। उसने 10 2 और व्यावसायिक पाठ्यक्रम वर्ष 2011 तक पूरा कर लिया था। उसका दावा था कि उसने पहले भी आवेदन दिया था बाद में उसने जून और जुलाई 2023 में आवेदन किया, जिसे बैंक ने फरवरी 2024 में खारिज कर दिया।
बैंक की ओर से अदालत को बताया गया कि 20 मार्च 1997 की लागू योजना के अनुसार कर्मचारी की मृत्यु के एक वर्ष के भीतर अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन करना आवश्यक था। यदि आश्रित नाबालिग हो तो भी अधिकतम चार वर्ष की समय-सीमा निर्धारित थी, बशर्ते पहले वर्ष के भीतर इसकी मांग की गई हो। रिकार्ड में ऐसा कोई दस्तावेज नहीं है जिससे साबित हो कि निर्धारित अवधि के भीतर कोई आवेदन किया गया था।
हाई कोर्ट ने कहा कि इस विषय पर कानून पूरी तरह स्थापित है कि अनुकंपा नियुक्ति “रोजगार का स्रोत नहीं है और न ही यह आश्रित का निहित अधिकार है।” यह सामान्य भर्ती प्रक्रिया का केवल एक अपवाद है, जिसका उद्देश्य मृतक कर्मचारी के परिवार को तत्काल आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना है।
अदालत ने कहा कि कर्मचारी की मृत्यु 24 मार्च 2003 को हुई, जबकि निर्धारित प्रारूप में आवेदन 5 जुलाई 2023 को, यानी लगभग 20 वर्ष बाद दिया गया। याचिकाकर्ता वर्ष 2010-11 तक बालिग होने के साथ आवश्यक शैक्षणिक योग्यता भी प्राप्त कर चुका था, लेकिन उसने समय-सीमा के भीतर दावा करने का कोई विश्वसनीय प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया। हाई कोर्ट ने कहा कि इतनी असाधारण और अस्पष्टीकृत देरी से यह स्वत अनुमान बनता है कि परिवार कर्मचारी की मृत्यु से उत्पन्न आर्थिक संकट से उबर चुका था। ऐसे में अनुकंपा नियुक्ति का मूल उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है। इन्हीं कारणों से अदालत ने बैंक के निर्णय में किसी प्रकार की अवैधता या त्रुटि न पाते हुए याचिका को निराधार मानकर खारिज कर दिया।
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