संजीव महाजन /नूरपुर-: 53 साल पहले पौंग बांध (महाराणा प्रताभ सागर झील ) का पानी केवल हजारों घर, खेत और पूरे गांव ही नहीं डुबोकर ले गया था, बल्कि लाखों सपनों को भी अपने साथ बहा ले गया था। उस समय लोगों से वादा किया गया था कि बदले में उन्हें जमीन मिलेगी, नया आशियाना मिलेगा और भविष्य सुरक्षित होगा। लेकिन आधी सदी से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी हजारों परिवार आज न्याय की आस लगाए बैठे हैं। कई लोग इस उम्मीद में दुनिया छोड़ गए, कई पीढ़ियां बूढ़ी हो गईं, लेकिन उनका इंतजार आज भी खत्म नहीं हुआ। यह सिर्फ जमीन का नहीं, बल्कि टूटे वादों, बिछड़े घरों और तीन पीढ़ियों के संघर्ष की कहानी है। वर्ष 1973 में पौंग बांध बनने से 20 हजार 722 परिवार विस्थापित हुए। इनमें से 16 हजार 352 परिवारों को पात्र घोषित किया गया।
सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार 1980 तक 9 हजार 196 परिवारों को भूमि मिली। इसके बाद 2000-2001 में 1 हजार 388, 2014 से 2017 के बीच 350 और इस वर्ष 2026 में करीब 400 परिवारों को मुरब्बों का आवंटन किया गया।फिर भी 5 हजार 418 मुरब्बों का आवंटन आज भी शेष है और हजारों परिवार अपने पुश्तैनी अधिकार की प्रतीक्षा कर रहे हैं। सरकारी फाइलों में दर्ज यह आंकड़े केवल संख्या नहीं, बल्कि हजारों अधूरे जीवन और टूटे हुए वादों की गवाही देते हैं।पौंग बांध से प्रभावित 20,722 परिवारों में से 16,352 परिवार पात्र घोषित किए गए थे। अब तक विभिन्न चरणों में हजारों परिवारों को भूमि आवंटित की जा चुकी है। वर्ष 2026 में अभी तक करीब 400 परिवारों को मुरब्बे दिए गए हैं।”सबसे दर्दनाक सच यह है कि जिन लोगों ने अपनी आंखों के सामने अपने घर, खेत, मंदिर और पूरे गांवों को डूबते देखा था, उनमें से अधिकांश अब इस दुनिया में नहीं हैं। कई माता-पिता अपने बच्चों से यह कहते हुए दुनिया से चले गए कि… “एक दिन हमारी जमीन जरूर मिलेगी…” लेकिन वह दिन उनके जीवन में कभी नहीं आया। आज उनके बच्चे भी बुजुर्ग हो चुके हैं और कई परिवारों की तीसरी पीढ़ी को यह तक नहीं पता कि उनके पूर्वजों के नाम पर आज भी मुरब्बा आवंटन का अधिकार सरकारी फाइलों में कैद है।
समय बीतता गया… चेहरे बदलते गए… लेकिन इंतजार नहीं बदला
आज भी 830 लंबित मामलों में अंतिम बार आवेदन मांगे गए हैं। करीब 2 हजार फाइलें आरएंडआर कार्यालय, राजा का तालाब और लगभग 1,500 फाइलें राजस्थान सरकार के विभिन्न स्तरों पर लंबित हैं।53 साल पहले पौंग का पानी गांवों को डुबो गया था… लेकिन विस्थापितों की उम्मीदें आज भी नहीं डूबी यह सिर्फ मुरब्बों के आवंटन की कहानी नहीं, बल्कि उन अधूरे वादों की कहानी है, जिन पर तीन पीढ़ियां भरोसा करती रहीं। आज भी हजारों आंखें उस दिन का इंतजार कर रही हैं, जब उन्हें सिर्फ जमीन का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों से किए गए वादे का सम्मान, न्याय और उनका खोया हुआ अधिकार वापस मिलेगा।पौंग की लहरों ने गांवों को डूबो दिया,लेकिन इंसाफ की उम्मीद आज भी किनारे पर खड़ी है। 53 वर्षों का यह इंतजार अब सिर्फ पुनर्वास का मुद्दा नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के सम्मान, उनके अस्तित्व और सरकारों से किए गए वादों की परीक्षा बन चुका है। अब देखना यह होगा कि क्या यह इंतजार यहीं खत्म होगा, या आने वाली चौथी पीढ़ी भी अपने बुजुर्गों की तरह सिर्फ एक वादे के सहारे जिंदगी गुजारने को मजबूर होगी।