लक्की मेहता| लुधियाना
समर न्यूज
शहर को अतिक्रमण मुक्त बनाने के नाम पर रेहड़ी-फड़ी वालों के खिलाफ अभियान चलाने वाला नगर निगम अब खुद अपने फैसलों से घिरता नजर आ रहा है। कुछ दिन पहले जिन रेहड़ी-फड़ी वालों को सड़कों और बाजारों से हटाया गया था, अब उन्हीं से तहबाजारी शुल्क लेकर दोबारा सड़क किनारे कारोबार करवाया जा रहा है।
निगम के इस यू-टर्न ने उसकी मंशा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। शहर में चर्चा है कि अब प्राथमिकता अतिक्रमण हटाने की नहीं, बल्कि उससे राजस्व कमाने की बन गई है। सूत्रों के अनुसार 17 जुलाई को तहबाजारी विभाग की समीक्षा बैठक में निगम कमिश्नर ने शहर के चारों जोनों को 10-10 लाख रुपये का राजस्व जुटाने का लक्ष्य दिया। इसके बाद अधिकारियों को ऐसे स्थानों से भी तहबाजारी शुल्क वसूलने के निर्देश दिए गए, जहां पहले कभी निगम की कोई आय नहीं होती थी।
इसके चलते कई इलाकों में रेहड़ी-फड़ी वालों की पर्चियां काटकर उन्हें फिर से सड़क किनारे कारोबार करने की अनुमति दिए जाने की बातें सामने आ रही हैं। बताया जा रहा है कि बिना छत वाली रेहड़ी से करीब 1500 रुपये और छत वाली रेहड़ी से 2500 रुपये तक तहबाजारी शुल्क वसूला जा रहा है। सवाल यह उठ रहा है कि यदि सड़कों पर रेहड़ियां ट्रैफिक बाधित कर रही थीं और इसी आधार पर उन्हें हटाया गया था, तो अब शुल्क लेकर उसी व्यवस्था को फिर से क्यों बढ़ावा दिया जा रहा है? निगम की इस कार्यप्रणाली ने पूरे अतिक्रमण विरोधी अभियान की गंभीरता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर यदि रेहड़ियां हटाना जरूरी था तो उन्हें दोबारा लगाने की अनुमति क्यों दी जा रही है? और यदि उन्हें नियमित करना ही उद्देश्य था तो फिर पहले कार्रवाई का इतना बड़ा अभियान क्यों चलाया गया?
शहर के प्रमुख बाजारों और व्यस्त सड़कों पर पहले से ही रेहड़ी-फड़ी के कारण जाम की स्थिति बनी रहती है। सड़क का बड़ा हिस्सा घिरने से वाहनों की आवाजाही प्रभावित होती है, जबकि फुटपाथों पर कब्जे के कारण पैदल चलने वालों को सड़क पर उतरना पड़ता है।