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हिमालय में विकास पर पर्यावरण की कसौटी,CEC ने तेज की समीक्षा

ग्लेशियर, वनों की कटाई और पर्यटन के बढ़ते दबाव पर होगी गहन पड़ताल

राहुल चावला, धर्मशाला-:हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ती विकासात्मक गतिविधियों के बीच पर्यावरणीय संतुलन को लेकर अब निगरानी और समीक्षा का दौर तेज हो गया है। ग्लेशियरों के पिघलने, जंगलों की कटाई, फोरलेन-टनल जैसी परियोजनाओं और पर्यटन स्थलों पर बढ़ते वाहनों के दबाव को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर गठित सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) ने हिमाचल प्रदेश में पर्यावरणीय स्थिति का आकलन शुरू कर दिया है।

धर्मशाला में हुई प्रारंभिक बैठक में कमेटी के सदस्यों ने प्रदेश के विभिन्न विभागों के अधिकारियों और पर्यावरण विशेषज्ञों के साथ कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की। कमेटी सदस्य डॉ. सतीश गड़कोटी के अनुसार, बैठक में करीब नौ प्रमुख पर्यावरणीय पहलुओं को समीक्षा के दायरे में रखा गया है। विशेषज्ञों और विभागीय अधिकारियों से मिले इनपुट के आधार पर कमेटी अपनी रिपोर्ट तैयार कर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आवश्यक सिफारिशें रखेगी।

जलवायु परिवर्तन और ग्लेशियरों पर विशेष फोकस

डॉ. गड़कोटी ने कहा कि हिमालय में ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना गंभीर चिंता का विषय है। इसका असर केवल हिमाचल या भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक चुनौती बन चुका है। कमेटी की समीक्षा में ग्लेशियरों के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन से जुड़े पहलुओं को भी प्रमुखता दी जा रही है।

सिर्फ पौधरोपण नहीं, पौधों का बचना भी जरूरी

विकास परियोजनाओं के दौरान होने वाली पेड़ों की कटाई और उसके एवज में किए जाने वाले पौधरोपण को लेकर भी कमेटी ने गंभीरता दिखाई है। डॉ. गड़कोटी ने कहा कि प्रतिपूरक वनीकरण का प्रावधान होने के बावजूद असली चुनौती लगाए गए पौधों की सर्वाइवल रेट है।उन्होंने कहा कि कागजों पर पौधरोपण का लक्ष्य पूरा करना पर्याप्त नहीं है। लगाए गए पौधों की नियमित निगरानी और उनके संरक्षण की व्यवस्था भी सुनिश्चित करनी होगी। पर्यावरणीय मंजूरी मिलने के बाद परियोजनाओं की प्रभावी मॉनिटरिंग को उन्होंने सबसे अहम कड़ी बताया।

पर्यटन स्थलों की कैरिंग कैपेसिटी तय करना जरूरी

पहाड़ी और पर्यटन क्षेत्रों में लगातार बढ़ रहे वाहनों के दबाव पर भी कमेटी ने चिंता जताई है। डॉ. गड़कोटी के मुताबिक हर सड़क और पर्यटन स्थल की एक निर्धारित कैरिंग कैपेसिटी होती है। ऐसे में यह तय करना जरूरी है कि किसी क्षेत्र में कितने वाहनों और पर्यटकों का दबाव पर्यावरण तथा स्थानीय बुनियादी ढांचे के लिए सुरक्षित है।

उन्होंने कहा कि हिमालय को अलग-अलग राज्यों के आधार पर नहीं, बल्कि एक संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्र के रूप में देखने की जरूरत है। हिमालयी राज्यों के लिए पर्यावरणीय संवेदनशीलता को ध्यान में रखकर नीतियां तैयार करना जरूरी है। कुछ क्षेत्रों को इकोलॉजिकली सेंसिटिव एरिया घोषित करने की दिशा में भी प्रयास किए जा रहे हैं।मानसून अवधि को देखते हुए कमेटी ने अतिरिक्त समय मांगा था, जिसके बाद उसे छह सप्ताह का समय मिला है। हालांकि, पर्यावरणीय मुद्दों की गंभीरता को देखते हुए कमेटी जल्द से जल्द अपनी रिपोर्ट तैयार कर सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही है।

Chandrika

chandrika@summerexpress.in

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