summer express , चंडीगढ़ (मोनिका रावत)। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने नाबालिग बच्ची से दुष्कर्म और हत्या के मामले में मौत की सजा पाए गुरप्रीत उर्फ गोपी को बड़ी राहत दी है। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की ओर से सुनाई गई मृत्युदंड की सजा को रद्द करते हुए आरोपित को संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया। जस्टिस विनोद एस. भारद्वाज और जस्टिस सुखविंदर कौर की खंडपीठ ने कहा कि मामले में परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी कड़ी स्थापित नहीं हो सकी और अभियोजन पक्ष की कहानी में कई गंभीर विरोधाभास सामने आए हैं।
मामला 13 फरवरी 2021 को जालंधर में हुई घटना से जुड़ा है। करीब साढ़े 12 साल की बच्ची घर के बाहर खेलते समय लापता हो गई थी। बाद में उसका शव गुरप्रीत उर्फ गोपी के घर के पिछले कमरे से बरामद किया गया था। मामले की सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने 23 सितंबर 2024 को गुरप्रीत को दोषी ठहराया था। इसके बाद 26 सितंबर 2024 को हत्या के अपराध में उसे मौत की सजा सुनाई गई। मृत्युदंड की पुष्टि के लिए राज्य सरकार की ओर से मामला हाईकोर्ट भेजा गया था।
हाईकोर्ट की सुनवाई के दौरान घटना की सूचना और प्राथमिकी दर्ज होने के समय को लेकर पुलिस रिकॉर्ड तथा गवाहों के बयानों में अंतर सामने आया। अदालत ने पाया कि पुलिस के आधिकारिक संस्करण के मुताबिक घटना की सूचना 14 फरवरी की सुबह 4:10 बजे मिली और प्राथमिकी सुबह 5:21 बजे दर्ज की गई। इसके विपरीत परिवार के सदस्यों और अन्य निजी गवाहों ने दावा किया कि पुलिस 13 फरवरी की शाम ही गांव पहुंच गई थी और रात करीब आठ से नौ बजे पुलिस की मौजूदगी में बच्ची का शव बरामद कर लिया गया था।
अदालत ने इस अंतर को गंभीर विरोधाभास माना और अभियोजन के मामले की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया। पीठ ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को परखते हुए कहा कि आरोप साबित करने के लिए आवश्यक साक्ष्यों की पूरी श्रृंखला आपस में मजबूती से जुड़ी हुई नहीं है।
मृतका के चाचा ने दावा किया था कि उसने बच्ची को 13 फरवरी की दोपहर करीब 3:45 से चार बजे के बीच गुरप्रीत के साथ जाते हुए देखा था। हालांकि अदालत ने इस बयान को भी संदेह की नजर से देखा। पीठ ने गौर किया कि बच्ची के लापता होने की जानकारी उसे शाम करीब छह बजे मिलने के बावजूद उसने यह महत्वपूर्ण तथ्य तत्काल अपने परिवार या पुलिस को नहीं बताया।
अदालत के अनुसार, शव बरामद होने और अगले दिन प्राथमिकी दर्ज किए जाने के दौरान भी चाचा ने बच्ची को गुरप्रीत के साथ जाते देखने की बात सामने नहीं रखी। उसका बयान पहली बार 16 फरवरी को दर्ज किया गया था। अदालत ने इस देरी को भी अभियोजन के मामले के लिए महत्वपूर्ण माना।
सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि गवाहों के मुताबिक बच्ची के शव के पास एक हथौड़ा और चप्पलें पड़ी मिली थीं। हालांकि इन परिस्थितियों को आरोपित के खिलाफ निर्णायक रूप से जोड़ने वाली साक्ष्य श्रृंखला पूरी तरह स्थापित नहीं हो सकी।
इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपित के खिलाफ मामला संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं रहा। ऐसे में गुरप्रीत उर्फ गोपी को संदेह का लाभ दिया गया और ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि तथा मृत्युदंड की सजा को रद्द करते हुए उसे बरी कर दिया गया।