Summer express, मोनिका रावत ,चंडीगढ़ | पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि वरिष्ठ नागरिकों के संरक्षण के लिए बनाए गए कानून का इस्तेमाल वैवाहिक या संपत्ति विवाद सुलझाने के लिए नहीं किया जा सकता।
अदालत ने सास की ओर से अपनी बहू को आवासीय संपत्ति से बेदखल करने की मांग वाली अपील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि अलग रह रहे पति की पत्नी को, यदि कानूनन साझा घर में रहने का अधिकार है, तो केवल वरिष्ठ नागरिक कानून के तहत कार्यवाही करके उसे घर से नहीं निकाला जा सकता। मामला गुरुग्राम की एक महिला से जुड़ा है, जिसने खुद को आवासीय संपत्ति की पूर्ण स्वामिनी बताते हुए अपनी बहू को घर से निकालने के लिए माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 का सहारा लिया था। महिला का कहना था कि पति की मृत्यु के बाद उसके दोनों बेटे संपत्ति में रह रहे थे और उसे किराया भी देते थे। बाद में छोटे बेटे ने किराया देना बंद कर दिया और मकान खाली कर दिया।
इसके बाद उसकी पत्नी ने उसे परेशान करना शुरू कर दिया। सास का दावा था कि बहू को संपत्ति में रहने की अनुमति मात्र थी और उसका कोई स्वतंत्र या पहले से मौजूद अधिकार नहीं था। खंडपीठ ने पाया कि सास के बेटे और बहू के बीच वैवाहिक विवाद चल रहा है। बहू ने भी वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत अलग आवेदन दायर कर रखा है, जो लंबित है। एकल पीठ ने पहले ही निष्कर्ष निकाला था कि सास ने बहू के खिलाफ कार्यवाही वास्तव में अपने बेटे के पक्ष में बचाव तैयार करने के उद्देश्य से शुरू की थी।
खास बात यह रही कि छोटे बेटे द्वारा किराया न देने का दावा न तो वरिष्ठ नागरिक न्यायाधिकरण के समक्ष उठाया गया था और न ही याचिका की सुनवाई के दौरान इसे साबित किया जा सका। हाई कोर्ट की पीठ ने कहा कि 2007 के कानून का मूल उद्देश्य बच्चों और रिश्तेदारों को वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और देखभाल की जिम्मेदारी के लिए बाध्य करना है। लेकिन इस कानून को वैवाहिक या संपत्ति विवाद के निपटारे के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के एक मामले का हवाला देते हुए कहा कि साझा घर में रहने के अधिकार को केवल इस आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता।अदालत ने यह भी गौर किया कि पति की मृत्यु के बाद विवादित संपत्ति में सास और
उसके दोनों बेटों का बराबर हिस्सा आया था।
इसके बावजूद सास ने केवल छोटे बेटे और उसकी पत्नी के खिलाफ कार्रवाई की, जबकि बड़े बेटे के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया। हाई कोर्ट ने माना कि यह परिस्थिति भी कार्यवाही के पीछे वास्तविक उद्देश्य को लेकर एकल पीठ द्वारा निकाले गए निष्कर्ष को मजबूत करती है। जस्टिस सुवीर सहगल और जस्टिस राजेश गौड़ की खंडपीठ ने एकल पीठ के आदेश में किसी तरह की त्रुटि या अवैधानिकता नहीं पाई। अदालत ने अपील को खारिज कर दिया। हालांकि अदालत ने कहा कि मामला भारी जुर्माने के साथ खारिज किया जाना चाहिए था, लेकिन सास की अधिक उम्र को देखते हुए यह लगाया नहीं जा रहा।