Summer express, रोहतक। पंडित भगवत दयाल शर्मा स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय (पीजीआईएमएस), रोहतक में डॉ. कुंदन मित्तल की पुनर्नियुक्ति का मामला एक बार फिर चर्चा में है। मेडिकल सुपरीटेंडेंट (एमएस) के पद पर उनकी पुनर्नियुक्ति पर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की रोक के बाद अब उन्हें पीडियाट्रिक पल्मोनोलॉजी एंड इंटेंसिव केयर विभाग से भी रिलीव कर दिया गया है। इससे पहले उन्हें एमएस का पद छोड़ना पड़ा था। इस घटनाक्रम के बाद संस्थान में सेवानिवृत्ति के बाद अधिकारियों की पुनर्नियुक्ति और सेवा विस्तार की प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे हैं।
डॉ. कुंदन मित्तल 30 जून 2026 को सेवानिवृत्त हुए थे। रिपोर्ट के अनुसार, इसके बाद सरकार ने उन्हें तीन साल का सेवा विस्तार दिया था। उनकी पुनर्नियुक्ति को लेकर नियुक्ति संबंधी नियमों, आयु सीमा और प्रक्रिया की वैधता पर सवाल उठाए गए। इसी मामले में डॉ. अनिल पन्निकर ने अदालत का दरवाजा खटखटाते हुए पुनर्नियुक्ति को चुनौती दी थी।
मामले की सुनवाई के दौरान पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने सितंबर 2026 में एमएस के पद पर डॉ. मित्तल की पुनर्नियुक्ति पर रोक लगा दी थी। अदालत के आदेश के बाद उन्हें इस प्रशासनिक पद से हटना पड़ा। अब उन्हें पीडियाट्रिक पल्मोनोलॉजी एंड इंटेंसिव केयर विभाग से भी रिलीव कर दिया गया है। हालांकि, विभाग से रिलीव करने के संबंध में विस्तृत प्रशासनिक आदेश और विश्वविद्यालय का आधिकारिक पक्ष अभी सामने नहीं आया है।
इस संबंध में हेल्थ यूनिवर्सिटी के जनसंपर्क अधिकारी डॉ. मंजूनाथ से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनसे बात नहीं हो सकी। ऐसे में विभागीय कार्रवाई के आधार और आगे की प्रशासनिक प्रक्रिया को लेकर आधिकारिक जानकारी का इंतजार है।
डॉ. मित्तल की पुनर्नियुक्ति का मामला राजनीतिक स्तर पर भी चर्चा में रहा। रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्व मंत्री मनीष ग्रोवर ने इस संबंध में मुख्यमंत्री कार्यालय को पत्र लिखा था। पत्र सामने आने के बाद पुनर्नियुक्ति को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में सवाल उठने लगे थे। हालांकि, किसी जनप्रतिनिधि की ओर से पत्र लिखा जाना अपने आप में नियुक्ति की वैधता या अवैधता का प्रमाण नहीं है। इस मामले में नियुक्ति संबंधी नियमों, सरकारी आदेशों और न्यायिक प्रक्रिया का महत्व है।
डॉ. मित्तल की पुनर्नियुक्ति को लेकर कांग्रेस नेताओं ने भी भाजपा सरकार पर निशाना साधा था। विपक्ष ने आरोप लगाया था कि सरकार नियमों को दरकिनार कर अपने पसंदीदा लोगों को महत्वपूर्ण पदों पर सेवा विस्तार दे रही है। कांग्रेस नेताओं ने भाजपा के ‘बिना पर्ची-बिना खर्ची’ के दावे पर सवाल उठाते हुए इस प्रकरण को सरकार के पारदर्शिता संबंधी दावों के विपरीत बताया था। हालांकि, ये विपक्ष की ओर से लगाए गए राजनीतिक आरोप हैं। नियुक्ति प्रक्रिया में किसी तरह की अनियमितता हुई या नहीं, इसका निर्धारण संबंधित दस्तावेजों, सेवा नियमों और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही किया जा सकता है।
डॉ. मित्तल के मामले के बाद पीजीआईएमएस में सेवानिवृत्ति के बाद अधिकारियों और चिकित्सकों को दोबारा नियुक्त करने तथा सेवा विस्तार देने की व्यवस्था पर भी चर्चा तेज हो गई है। रिपोर्ट में संस्थान के अन्य प्रशासनिक पदों से जुड़े मामलों पर भी कानूनी संकट की आशंका जताई गई है, हालांकि अन्य मामलों में किसी विशिष्ट अदालती आदेश या कार्रवाई का विवरण उपलब्ध नहीं है। सरकारी संस्थानों में वरिष्ठ पदों पर नियुक्ति और सेवा विस्तार के दौरान आयु सीमा, सेवा शर्तों, नियुक्ति के आधार और संबंधित आदेशों की वैधता जैसे पहलुओं का पालन जरूरी होता है।
फिलहाल डॉ. कुंदन मित्तल की एमएस पद पर पुनर्नियुक्ति पर हाईकोर्ट की रोक और इसके बाद विभाग से रिलीव किए जाने की कार्रवाई इस मामले के प्रमुख घटनाक्रम हैं। आगे की स्थिति अदालत के आदेशों, विश्वविद्यालय के प्रशासनिक फैसलों और संबंधित पक्षों के आधिकारिक बयानों से स्पष्ट होगी। पीजीआईएमएस जैसे बड़े चिकित्सा संस्थान में वरिष्ठ प्रशासनिक और चिकित्सकीय पदों पर नियुक्तियों का असर संस्थान के संचालन, जवाबदेही और पारदर्शिता पर पड़ता है। ऐसे में यह मामला सरकारी संस्थानों में सेवानिवृत्ति के बाद सेवा विस्तार और पुनर्नियुक्ति की प्रक्रिया पर भी ध्यान केंद्रित करता है।