गुरुग्राम | केंद्रीय राज्य मंत्री राव इंद्रजीत सिंह ने 1975 में लगे आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का काला अध्याय करार देते हुए कहा कि आज की युवा पीढ़ी को उस दौर की सच्चाई और लोकतंत्र पर पड़े उसके असर के बारे में जानना बेहद ज़रूरी है। वे मंगलवार को गुरुग्राम में भाजपा के गुरुकमल कार्यालय में आयोजित पत्रकार वार्ता को संबोधित कर रहे थे।
उन्होंने कहा, “देश में अब तक तीन बार आपातकाल लागू हुआ, लेकिन 1975 की इमरजेंसी सबसे ज्यादा प्रजातंत्र के लिए घातक साबित हुई। आज जब इस घटना को 50 वर्ष पूरे हो चुके हैं, तब हमारा दायित्व है कि हम लोगों को उस समय हुई लोकतांत्रिक हानि के बारे में जागरूक करें।”
इंदिरा गांधी के फैसले से मचा था राजनीतिक भूचाल
राव इंद्रजीत सिंह ने बताया कि 1971 के आम चुनाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग का आरोप लगा, जिसके चलते हाईकोर्ट ने उनके चुनाव को रद्द कर, छह साल तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाया। इंदिरा गांधी ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन कोर्ट ने केवल प्रधानमंत्री पद पर बने रहने की अनुमति दी थी।
इस बीच देश में उथल-पुथल का माहौल बना रहा। जेपी आंदोलन के माध्यम से जयप्रकाश नारायण ने देशभर में जनता को सरकार के खिलाफ खड़ा किया। इसी पृष्ठभूमि में 25 जून 1975 को इंदिरा गांधी ने देशभर में आपातकाल लागू कर दिया।
नसबंदी, गिरफ्तारियां और डर का माहौल
मंत्री ने कहा कि इमरजेंसी के दौरान एक करोड़ से ज्यादा नसबंदी अभियान चलाए गए और करीब 26 हजार राजनीतिक नेताओं को जेल में डाला गया। उस समय देश की जेलों में 1.88 लाख कैदियों की क्षमता थी, लेकिन दो लाख से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया, जिसमें नेताओं के समर्थक और आम नागरिक भी शामिल थे।
इमरजेंसी के खिलाफ जनमत ने बदल दी सरकार
राव इंद्रजीत ने बताया कि जब दो साल बाद 1977 में चुनाव हुए, तो जनता ने कांग्रेस पार्टी को सत्ता से बाहर कर दिया। “देश ने तानाशाही प्रवृत्ति को नकारा और लोकतंत्र को फिर से मजबूत किया,” उन्होंने कहा।
नई पीढ़ी को सिखाना जरूरी
उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी को यह जानना जरूरी है कि लोकतंत्र को बनाए रखने के लिए कितने संघर्ष किए गए। “हम लोगों के बीच जाकर यह संदेश दे रहे हैं ताकि भविष्य में कभी फिर ऐसा माहौल न बने,” मंत्री ने कहा।