17 July, 2025
सावन की रिमझिम फुहारों के बीच जब धरती हरी चूनर ओढ़ती है, तब हरियाली तीज का पर्व सुहागिनों के जीवन में नई उमंग और श्रद्धा लेकर आता है। यह पर्व न केवल प्रकृति की हरियाली का उत्सव है, बल्कि यह शिव-पार्वती के दिव्य मिलन की स्मृति में मनाया जाने वाला स्त्री आस्था का प्रतीक पर्व भी है।
क्या है हरियाली तीज का महत्व?
हरियाली तीज हिंदू पंचांग के अनुसार श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है। यह पर्व मुख्य रूप से उत्तर भारत – विशेष रूप से राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश और हरियाणा में धूमधाम से मनाया जाता है। इसे सौभाग्य, प्रेम और समर्पण का पर्व माना जाता है।
इस दिन महिलाएं व्रत रखती हैं, झूला झूलती हैं, लोकगीत गाती हैं और शिव-पार्वती की पूजा कर अपने वैवाहिक जीवन की सुख-शांति और पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं।
सुहागिनों के लिए विशेष दिन
हरियाली तीज को सुहागिनों के सौंदर्य और श्रृंगार का पर्व भी कहा जाता है। महिलाएं इस दिन हरी साड़ियां, चूड़ियां और मेंहदी लगाकर सजती-संवरती हैं। हरे रंग को इस पर्व में समृद्धि और प्रेम का प्रतीक माना गया है।
प्रकृति और पर्व का अद्भुत मेल
सावन का महीना वैसे ही भारतीय मानसून का प्रतीक है, और हरियाली तीज उस मौसम में जीवन के उल्लास का उत्सव बन जाती है। झूले, लोकगीत, पारंपरिक नृत्य और पकवान इस पर्व को सांस्कृतिक दृष्टि से भी समृद्ध बनाते हैं।
धार्मिक मान्यता
पौराणिक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए कठोर तप किया था, और तृतीया के दिन शिव ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया था। इसी उपलक्ष्य में यह व्रत सौभाग्यवती स्त्रियों द्वारा किया जाता है।
त्योहार से जुड़े लोकाचार
- महिलाएं झूले पर बैठकर तीज गीत गाती हैं।
- सासें बहुओं को सिंजारा (वस्त्र, श्रृंगार, मिठाई) देती हैं।
- मंदिरों और घरों में शिव-पार्वती की पूजा होती है।
- ‘घुघरी’, ‘खीर’, ‘गुजिया’ जैसे पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं।
- हरियाली तीज: परंपरा में पर्यावरण का संदेश
हरियाली तीज केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति से जुड़ाव का संदेश भी देती है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि जब धरती हरी होती है, तभी जीवन में खुशहाली आती है। हरियाली तीज, वास्तव में, प्रकृति, प्रेम और परंपरा का सुंदर संगम है।