चीन | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगले सप्ताह चीन के तियानजिन में होने वाले शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन में शामिल होंगे। इस दौरान वे चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से अलग-अलग द्विपक्षीय बैठक करेंगे। खास बात यह है कि यह पीएम मोदी की पिछले सात वर्षों में पहली चीन यात्रा होगी। इससे पहले उन्होंने साल 2018 में वुहान में शी जिनपिंग से अनौपचारिक मुलाकात की थी।
अमेरिका के साथ बढ़ते तनाव की पृष्ठभूमि
यह बैठक ऐसे समय में हो रही है जब भारत और अमेरिका के बीच आर्थिक और कूटनीतिक खींचतान तेज हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के प्रमुख निर्यात उत्पादों जैसे इस्पात, कपड़ा और कृषि सामान पर 50 प्रतिशत तक टैरिफ बढ़ा दिया है। इससे भारतीय निर्यातकों को भारी नुकसान हो रहा है। भारत ने इस मुद्दे को विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में उठाया है और जवाबी कदम उठाने के संकेत भी दिए हैं। साथ ही अमेरिका, रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर दबाव बढ़ा रहा है, जिसमें भारत भी शामिल है। इससे दोनों देशों के रिश्तों में तनाव और गहराता जा रहा है।
भारत-चीन रिश्तों में नरमी के संकेत
गलवान घाटी में 2020 की झड़प के बाद भारत और चीन के संबंध बेहद तनावपूर्ण रहे। हालांकि हाल के महीनों में दोनों देशों ने बातचीत के जरिए तनाव कम करने की कोशिश शुरू की है। वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर सैनिक तैनाती अब भी बनी हुई है, लेकिन यह बैठक इस बात का संकेत है कि रिश्तों को धीरे-धीरे पटरी पर लाने की कोशिश हो रही है।
रूस-भारत की साझेदारी और गहराएगी
रूस, पश्चिमी प्रतिबंधों और यूक्रेन युद्ध के बावजूद भारत को अपना रणनीतिक साझेदार मानता है। पीएम मोदी और राष्ट्रपति पुतिन की बैठक में रक्षा, ऊर्जा और आर्थिक सहयोग पर अहम चर्चा होने की उम्मीद है। साथ ही भारत, रूस और चीन के बीच त्रिपक्षीय संवाद को आगे बढ़ाने पर भी विचार हो सकता है।
एससीओ मंच का महत्व
शंघाई सहयोग संगठन में लगभग 20 देश शामिल हैं, जिनमें मध्य एशिया, दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व के कई देश हैं। यह मंच सुरक्षा, आर्थिक सहयोग और राजनीतिक संवाद के लिए अहम माना जाता है। चीन इसे वैश्विक दक्षिण के नेतृत्व का अवसर मानता है, जबकि भारत इसे अपनी बहुपक्षीय विदेश नीति को मजबूत करने और बड़े देशों के बीच संतुलन बनाने का माध्यम देखता है।
क्यों अहम है यह दौरा
अमेरिका के साथ बढ़ते तनाव और रूस-चीन से सहयोग की कोशिशों के बीच यह यात्रा भारत की विदेश नीति की दिशा तय करेगी। मोदी की यह मुलाकातें यह संदेश देंगी कि भारत किसी एक ध्रुव पर निर्भर रहने के बजाय स्वतंत्र विदेश नीति अपनाकर वैश्विक संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है।