8 September, 2025
भाद्रपद मास की पूर्णिमा तिथि 7 सितंबर को सम्पन्न हुई और इसके साथ ही पितृपक्ष का शुभारंभ हो गया है। हिंदू धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व माना जाता है। यह वह पावन काल है जब लोग अपने पूर्वजों को श्रद्धा भाव से स्मरण कर उनकी आत्मा की शांति और आशीर्वाद के लिए धार्मिक कर्मकांड करते हैं। मान्यता है कि इस दौरान किए गए श्राद्ध, तर्पण और दान सीधे पितरों तक पहुंचते हैं और वे प्रसन्न होकर वंशजों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
श्राद्ध और पिंडदान का महत्व
पितृपक्ष में श्राद्ध और तर्पण प्रमुख धार्मिक अनुष्ठान हैं। पिंडदान से पितरों की आत्मा को तृप्ति और शांति मिलती है। परंपरा है कि इससे घर-परिवार में उन्नति और समृद्धि आती है।
दान से मिलता है पुण्य
हिंदू शास्त्रों में दान को सर्वोच्च पुण्य कहा गया है। पितृपक्ष में अन्न, वस्त्र, जल और अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान विशेष फलदायी माना गया है। श्रद्धापूर्वक किया गया दान पितरों तक पहुंचता है और वे प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं।
व्रत का महत्व
श्राद्ध तिथि पर व्रत रखने से आत्मा की शुद्धि होती है। मान्यता है कि पितृदेव संतुष्ट होकर साधक के कष्टों को दूर करते हैं।
पंचबलि कर्म
पितृपक्ष में पंचबलि कर्म का विशेष महत्व है। इसमें गाय, कुत्ता, कौवा, चींटी और मछली को अन्न व जल अर्पित किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि ऐसा करने से पितर प्रसन्न होते हैं और घर में शांति व समृद्धि आती है।
दीपदान और पीपल पूजा
पितृपक्ष में दक्षिण दिशा की ओर दीपक जलाना शुभ माना जाता है। यह पितरों की दिशा मानी जाती है और इसमें चौमुखी दीपक जलाने का भी विधान है।
साथ ही, शास्त्रों के अनुसार पीपल वृक्ष के नीचे दीपक जलाना पितरों की कृपा प्राप्त करने का सरल उपाय बताया गया है।