नई दिल्ली। देश की प्रमुख टेलीकॉम कंपनियां — रिलायंस जियो, एयरटेल और वोडाफोन-आइडिया — ने केंद्र सरकार से 6 गीगाहर्ट्ज़ फ्रीक्वेंसी बैंड को सिर्फ मोबाइल सेवाओं के लिए नीलामी के जरिए आवंटित करने की मांग की है। कंपनियों का कहना है कि इस बैंड को वाई-फाई जैसी लाइसेंस-फ्री सेवाओं के लिए विभाजित करना भारत में भविष्य की 5G और 6G सेवाओं की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है।
टेलीकॉम कंपनियों के अनुसार, 6 GHz बैंड मिड-बैंड स्पेक्ट्रम के रूप में बेहद अहम है, जो देशभर में व्यापक 5G कवरेज और आने वाले समय में 6G नेटवर्क विस्तार के लिए जरूरी है। उनका कहना है कि भारत को 6G तकनीक में वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बढ़त दिलाने के लिए हर ऑपरेटर को कम से कम 400 मेगाहर्ट्ज स्पेक्ट्रम मिलना चाहिए।
वर्तमान प्रस्ताव के तहत, चार ऑपरेटरों के लिए सिर्फ 175 मेगाहर्ट्ज स्पेक्ट्रम उपलब्ध कराया जा सकता है, जिसे कंपनियां अपर्याप्त बता रही हैं। उन्होंने सरकार को सुझाव दिया है कि स्पेक्ट्रम की नीलामी तभी हो, जब पूरा 6 GHz बैंड एक साथ उपलब्ध हो जाए। फिलहाल इसका एक हिस्सा सैटेलाइट सेवाओं द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा है, जो 2030 के आसपास खाली होने की संभावना है।
इसके साथ ही कंपनियों ने अपने पास मौजूद स्पेक्ट्रम की वैधता अवधि 20 साल से बढ़ाकर 40 साल करने की मांग भी दोहराई है, ताकि दीर्घकालिक निवेश की भरपाई हो सके।
जियो ने सरकार से कहा कि भारत में जनसंख्या घनत्व अमेरिका और चीन जैसे देशों से कहीं अधिक है, जिससे नेटवर्क पर दबाव भी ज्यादा रहता है। ऐसे में अच्छी कनेक्टिविटी और स्थिर मोबाइल नेटवर्क के लिए पर्याप्त स्पेक्ट्रम आवंटन बेहद जरूरी है।