नई दिल्ली | अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को एक और बड़ा कानूनी झटका लगा है। फेडरल कोर्ट ने उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसके तहत ट्रंप प्रशासन कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के लिए जारी सरकारी फंड को तुरंत रोकना चाहता था। यह फैसला ऐसे समय आया है जब ट्रंप सरकार ने कई विश्वविद्यालयों पर यह आरोप लगाया था कि वे नस्लीय भेदभाव और यहूदी-विरोधी गतिविधियों को बढ़ावा दे रहे हैं।
कोर्ट का फैसला
सैन फ्रांसिस्को की जिला अदालत की जज रीटा लिन ने स्पष्ट कहा कि प्रशासन न तो विश्वविद्यालय से फंड में कटौती कर सकता है और न ही तत्काल कोई जुर्माना लगा सकता है। अदालत ने उन यूनियनों और संगठनों की याचिकाओं का भी समर्थन किया है, जो छात्रों, कर्मचारियों और फैकल्टी के हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन याचिकाकर्ताओं का दावा है कि ट्रंप प्रशासन अपनी कार्रवाई के माध्यम से विरोधी आवाज़ों को दबाना चाहता है, जो अमेरिकी संविधान के खिलाफ है।
ट्रंप प्रशासन का दावा
ट्रंप प्रशासन ने कई प्रतिष्ठित कॉलेजों को “उदारवादी और यहूदी-विरोधी विचारधारा से प्रभावित” बताया था और दर्जनों विश्वविद्यालयों की जांच शुरू करवाई थी। उनका आरोप था कि विविधता और समावेशन के नाम पर श्वेत और एशियाई छात्रों के साथ अन्याय किया जा रहा है, जो नागरिक अधिकार कानून का उल्लंघन है।
1.2 अरब डॉलर का जुर्माना और फंड पर रोक
ट्रंप प्रशासन ने कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय पर 1.2 अरब डॉलर का भारी जुर्माना लगाया और रिसर्च फंड पर रोक लगा दी। इसके अलावा, कोलंबिया सहित अन्य निजी विश्वविद्यालयों के फेडरल फंड पर भी इसी तरह की कार्रवाई की गई थी।
यूसी के अध्यक्ष जेम्स बी. मिलिकेन ने इस जुर्माने पर कहा था कि इतना बड़ा दंड विश्वविद्यालय की बुनियाद हिला सकता है और इसके संचालन को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है। अदालत का यह फैसला फिलहाल विश्वविद्यालयों को राहत देता है और ट्रंप प्रशासन की उस नीति पर गंभीर सवाल उठाता है, जिसके तहत वह विश्वविद्यालयों पर राजनीतिक और वैचारिक दबाव बनाने की कोशिश कर रहा था।