नूंह। पूरे साल प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की बैठकों और योजनाओं के बावजूद जिले में प्रदूषण की स्थिति जस की तस बनी रही। नूंह के ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में कोयला भट्टियां, क्रशर प्लांट, बूचड़खाने, अवैध ढाबे और डेयरीज़ से निकलने वाला धुआं और गंध लोगों की सांसों के लिए खतरनाक साबित हुई।
स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासन द्वारा की गई छापामारी और कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित रही। जमीन पर कहीं भी सख्ती नहीं दिखाई दी, जिसका सीधा असर हवा, पानी, मिट्टी और स्वास्थ्य पर पड़ा।
कृषि और पर्यावरण पर असर:
जिले में लंबे समय से चल रही कोयला भट्टियों और क्रशर संयंत्रों के कारण किसानों की फसलों पर गंभीर असर पड़ा। धूल और रासायनिक प्रदूषक फसलों को प्रभावित कर लगभग 60-70 प्रतिशत तक कृषि उत्पादन घटा। सरकारी नियम और लाइसेंस व्यवस्था यहां केवल औपचारिकता बनकर रह गई।
प्रदूषण फैलाने वाले मुख्य स्रोत:
- बूचड़खाने: बिना मानक के चल रहे बूचड़खानों से जहरीला धुआं और बदबू फैल रही है। मांस के अवशेष खुले में फेंके जाने से जल, मिट्टी और हवा प्रदूषित हुई है। आवारा मांसाहारी कुत्तों की संख्या बढ़ी, जिससे बीमारी और खतरा भी बढ़ गया।
- अवैध कोयला भट्टियां: पुन्हाना क्षेत्र में चल रही अवैध भट्टियों से निकलने वाला काला धुआं पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है। इससे सांस और हृदय संबंधी रोग बढ़ रहे हैं, मिट्टी की उपज क्षमता घट रही है और वायु गुणवत्ता बेहद खराब हो रही है।
- क्रशर प्लांट: फिरोजपुर झिरका, तावडू और पुन्हाना के क्रशर प्लांटों से उड़ने वाली धूल से दमा, टीबी और फसलों को नुकसान हुआ। फसलों और पेड़ों पर लगभग 70 प्रतिशत तक असर पड़ा।
- अवैध तंदूर और ढाबे: अवैध ढाबों और तंदूरों से वायु में जहरीला धुआं और कई प्रकार की गैसें फैल रही हैं, जिससे लोगों के स्वास्थ्य पर सीधे खतरे बढ़े।
स्थानीय लोगों का कहना है कि पूरे साल कार्रवाई की मांग करने के बावजूद प्रशासन ने सख्ती नहीं दिखाई, जिससे प्रदूषण और इसके प्रभाव लगातार बढ़ते गए।